लुप्तप्राय पौधे में मिले शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट और कैंसर-रोधी यौगिक, पहला वैज्ञानिक अध्ययन चौंकाने वाले नतीजे लाया
सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
लुमामी (नगालैंड)। मेघालय के घने जंगलों में छिपा एक दुर्लभ और लुप्तप्राय पौधा अब वैज्ञानिकों की नजर में ‘प्रकृति का चमत्कार’ बन गया है! गोनियोथैलेमस सिमोंसी हुक. एफ. थॉमस. (गारो हिल्स की स्थानीय बोली में “ME MANG TE GATCHU”) नामक इस स्थानिक औषधीय पौधे पर पहला व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन पूरा हुआ है, जो कैंसर से लड़ने, एंटीबायोटिक प्रतिरोध को तोड़ने और मलेरिया-टाइफाइड जैसी घातक बीमारियों के सुरक्षित इलाज का नया रास्ता खोल सकता है। नगालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने असम डाउनटाउन विश्वविद्यालय के साथ मिलकर यह ऐतिहासिक अध्ययन किया।
नतीजे में यह पौधा शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट, रोगाणुरोधी और कैंसर-रोधी जैवसक्रिय फाइटोकेमिकल्स का खजाना साबित हुआ! स्थानीय आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से गले की जलन, जठरांत्र समस्याओं, टाइफाइड और मलेरिया के इलाज में इसका इस्तेमाल करते आए हैं – लेकिन अब पहली बार विज्ञान ने इसकी पुष्टि की है।
अध्ययन के चौंकाने वाले निष्कर्ष:कैंसर पर प्रहार:
पौधे के अर्क ने लैब टेस्ट में कोलन कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोका। कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग से पता चला कि इसके यौगिक कैंसर प्रोटीन से सीधे लड़ते हैं!
मल्टी-एक्टिव पावर: एंटीऑक्सीडेंट, सूजनरोधी, मधुमेह-रोधी, रोगाणुरोधी गुण। सिंथेटिक दवाओं के साइड इफेक्ट्स से बचाव का प्राकृतिक विकल्प हो सकता है। इस अध्ययन से पारंपरिक ज्ञान पर एक बार फिर मुहर लगी है।
पौधा लंबे समय से स्थानीय समुदायों द्वारा जठरांत्र संबंधी जटिलताओं, गले में जलन, टाइफाइड बुखार और मलेरिया के इलाज के लिए उपयोग किया जाता रहा है, लेकिन इससे पहले इसकी वैज्ञानिक या औषधीय क्षमता का अध्ययन कभी नहीं किया गया था।
यह अध्ययन पौधे के पारंपरिक उपयोग के लिए वैज्ञानिक प्रमाण प्रदान करता है और यह दर्शाता है कि जी. सिमोंसी शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट, रोगाणुरोधी और कैंसर-रोधी गतिविधियों वाले जैवसक्रिय फाइटोकेमिकल्स का एक समृद्ध स्रोत है। उन्नत विश्लेषणात्मक उपकरणों और कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग का उपयोग करते हुए, टीम ने प्रदर्शित किया कि इस प्रजाति के प्राकृतिक यौगिक कैंसर-संबंधी प्रोटीन के साथ कैसे परस्पर क्रिया करते हैं, जिससे नई, प्रकृति-आधारित चिकित्सीय दवाओं के विकास के लिए बहुमूल्य सुराग मिलते हैं।
आईयूसीएन की ‘लुप्तप्राय’ वनौषधियों की सूची में शामिल इस पौधे की उपलब्धता घट रही है, लेकिन शोध से संरक्षण की नई उम्मीद जगी है।
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. मयूर मौसूम फुकन (सहायक प्रोफेसर, वानिकी विभाग, नगालैंड विश्वविद्यालय) और उनके छात्र सैमसन रोज़ली संगमा ने उन्नत टूल्स से यौगिकों की पहचान की। निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय जर्नल केमिस्ट्री एंड बायोडायवर्सिटी के अक्टूबर 2025 अंक में प्रकाशित।
डॉ. मयूर मौसूम फुकन के मुताबिक “यह अध्ययन एंटीबायोटिक प्रतिरोध और क्रॉनिक बीमारियों के दौर में पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ता है। भारत की जैव विविधता में दवा खोज की अपार संभावनाएं छिपी हैं!”
सह-लेखक टीम:सैमसन रोज़ली संगमा (शोध छात्र)
डॉ. ध्रुबज्योति गोगोई (असम डाउनटाउन विश्वविद्यालय)
डॉ. प्रणय पुंज पंकज (नगालैंड विश्वविद्यालय)
वाहशी चोंगलोई (शोध छात्रा)
नगालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश के. पटनायक ने कहा, “यह शोध दुर्लभ प्रजाति के संरक्षण और पारंपरिक-अाधुनिक विज्ञान की खाई पाटने में मील का पत्थर है।”शोध छात्र सैमसन ने सतर्क किया है कि “यह पौधा अब सिर्फ कुछ जंगलों तक सीमित है। वैज्ञानिक डेटा से संरक्षण और खेती की मुहिम तेज होगी, वरना यह खजाना हमेशा के लिए खो जाएगा!”
यह अध्ययन न केवल नई दवाओं का द्वार खोलता है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता को वैश्विक पटल पर लाता है।