तीर्थाटन और पर्यटन में हो संतुलन : Dr Nishank का मंत्र-भीड़ नहीं, गुणवत्ता जरूरी

Lekhak Gaon में आयोजित 'UTRA' के मंथन कार्यक्रम में डॉ. निशंक ने कहा कि उत्तराखंड में पर्यटन नीति का आधार तीर्थाटन और संस्कृति बने। केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना मकसद न हो, बल्कि वहन क्षमता का ध्यान रखें। साथ ही, स्लो टूरिज्म और आध्यात्मिक सर्किट विकसित कर राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दें...

थानो/देहरादून। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए पर्यटन केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि इसकी जीवनरेखा और पहचान का मूल आधार है। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य की पर्यटन नीतियां अपनी सीमाओं और मूल आत्मा को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं? पूर्व मुख्यमंत्री और भारत सरकार के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का ताजा बयान इसी यक्ष प्रश्न पर सीधा प्रहार करता है। ‘उत्तरा’ (Uttarakhandi Tourism Representatives Association) के मंथन कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने साफ कहा कि उत्तराखंड को ‘तीर्थाटन’ और ‘पर्यटन’ के बुनियादी अंतर को समझते हुए अपनी भावी नीतियां तय करनी होंगी।

डॉ. निशंक का यह दृष्टिकोण इसलिए भी विश्लेषणात्मक धरातल पर खरा उतरता है क्योंकि उत्तराखंड की पारिस्थितिकी (Ecology) और अर्थव्यवस्था (Economy) के बीच संतुलन बनाना अब बेहद जरूरी हो गया है। तीर्थाटन का संबंध आत्मा, आस्था और अनुशासित आचरण से है, जबकि पर्यटन का जुड़ाव मनोरंजन, प्रकृति दर्शन और स्थानीय संस्कृति से है। जब इन दोनों अवधारणाओं को एक ही चश्मे से देखा जाता है, तो चारधाम यात्रा जैसी पवित्र व्यवस्थाओं पर अत्यधिक भीड़ और अव्यवस्था का दबाव बढ़ता है।Lekhak Gaon में उत्तराखंडी टूरिज्म रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन के सदस्यों के साथ मंथन करते डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक'।

राज्य के पर्यटन स्थलों की ‘वहन क्षमता’ (Carrying Capacity) को ध्यान में रखना आज समय की सबसे बड़ी मांग है। यदि विकास केवल पर्यटकों की संख्या के आंकड़ों में आंका जाएगा, तो हिमालयी क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना और स्थानीय जीवनशैली को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। पर्यटन का वास्तविक उद्देश्य अनियंत्रित भीड़ जुटाना नहीं, बल्कि आने वाले हर व्यक्ति को एक अविस्मरणीय और गुणवत्तापूर्ण अनुभव प्रदान करना होना चाहिए। उनका कहना था कि स्लो टूरिज्म स्थानीय संस्कृति, लोक परंपराओं, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

इसके लिए ‘स्लो टूरिज्म’ (धीमा एवं शांत पर्यटन), साहित्य और आध्यात्मिक सर्किट का विकास एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है। स्लो टूरिज्म का मतलब है कि पर्यटक हड़बड़ी में मुख्य स्थलों पर भीड़ लगाने के बजाय गांवों में ठहरें, स्थानीय भोजन, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ाव महसूस करें। इससे न केवल मुख्य शहरों पर दबाव कम होगा, बल्कि ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए साधन सृजित होंगे और पलायन पर भी अंकुश लगेगा।

डॉ. निशंक ने कहा कि नीति निर्माताओं, होटल व्यवसायियों और ट्रैवल ऑपरेटरों को मिलकर एक ऐसा रोडमैप तैयार करना होगा जहां अधोसंरचना (Infrastructure) का विकास पर्यावरण की कीमत पर न हो। उत्तराखंड की असली ताकत उसकी पवित्रता, शांति और प्राकृतिक सुंदरता है। यदि नीति में इन तीनों का संरक्षण शामिल नहीं होगा, तो राज्य अपने मूल स्वरूप को खो देगा। समय आ गया है कि उत्तराखंड केवल गंतव्य (Destination) न बने, बल्कि सतत और संवेदनशील पर्यटन का वैश्विक मॉडल बनकर उभरे।

कार्यक्रम के दौरान कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए :

औपचारिक पंजीकरण: ‘उत्तरा’ को उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद से पंजीकृत करने की मांग।

—सलाहकार समिति में प्रतिनिधित्व: परिषद की सलाहकार समिति में ‘उत्तरा’ सदस्यों को शामिल करने का प्रस्ताव।

—उत्तरा पर्यटन सम्मान: क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य और नवाचार करने वाले उद्यमियों को सम्मानित करने का निर्णय।

—डिजिटल स्किल डेटाबेस: युवाओं के कौशल विकास हेतु हर जिले में प्रशिक्षित मानव संसाधन का पोर्टल डेटाबेस।

—राष्ट्रीय संगोष्ठी: लेखक गांव में ‘जिम्मेदार पर्यटन’ (Responsible Tourism) पर नेशनल सेमिनार का आयोजन।

—सतत टूरिज्म मॉडल: सर्किट विकास, स्लो टूरिज्म और स्थानीय भागीदारी आधारित मॉडल पर सर्वसम्मति।

कार्यक्रम में ‘उत्तरा’ के अध्यक्ष प्रशांत मैठाणी ने संगठन की भावी कार्ययोजना प्रस्तुत करते हुए कहा कि उत्तराखंड में पर्यटन को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि स्थानीय समाज, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ा जनआंदोलन बनाने की दिशा में संगठन कार्य करेगा।

इस अवसर पर उपाध्यक्ष सुनील राणा, सचिव देव पोखरियाल, संयुक्त सचिव मोहित शर्मा एवं अजय कंडारी, कोषाध्यक्ष महेंद्र घिल्डियाल, कार्यकारिणी सदस्य गजेंद्र मेहरा, राकेश पंत, गौरव शर्मा, अल्पेश कुमार सहित प्रदेशभर से आए पर्यटन उद्यमियों ने अपने विचार रखते हुए उत्तराखंड में सतत, जिम्मेदार एवं रोजगारपरक पर्यटन मॉडल विकसित करने पर जोर दिया।

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