देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र नगरी हरिद्वार के **गंगा तट पर एक अनोखा सांस्कृतिक संगम** देखने को मिला। इस अवसर पर **मां संस्कृत की गोद में बेटी हिंदी** ने कदम रखा और विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के रूप में उत्तराखंड संस्कृत अकादमी परिसर में आयोजित वार्षिक अधिवेशन एवं सम्मान समारोह में भाग लिया।
इस पावन आयोजन की मेजबानी **उत्तराखंड शासन के संस्कृत शिक्षा निदेशक डॉ आनन्द भारद्वाज** ने की। उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्ज्वलन किया गया, जिसमें विद्यापीठ के कुलपति **डॉ दयानन्द जायसवाल**, माउंट आबू ब्रह्माकुमारीज़ मुख्यालय से आए प्रोफेसर सतेंद्र भाई, दिल्ली से डॉ विनोद बब्बर और अन्य गणमान्य अतिथियों ने भाग लिया। रुड़की के गीतकार **अनिल अमरोही** ने सरस्वती वंदना एवं कुलगीत प्रस्तुत कर सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया।
उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव व संस्कृत शिक्षा निदेशक **डॉ आनन्द भारद्वाज** ने कहा कि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है और हिंदी उसकी सजीव बेटी। आज हिंदी रूपी बेटी ने अपनी मां संस्कृत से मिलने के साथ देशभर से आए साहित्यकारों का स्वागत किया।
कार्यक्रम में विशेष रूप से तीन नई हिंदी पुस्तकें प्रस्तुत की गईं — **आत्म मंथन, श्रीगोपाल काव्यधारा में अध्यात्म, दादी और विभव**, जो केवल तीन महीनों में तैयार की गईं। इनका विमोचन विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के मंच पर किया गया।
इस अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ संस्था के सदस्य भी उपस्थित थे, जिनकी आध्यात्मिक उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भी पावन बना दिया। दिवंगत ब्रह्माकुमारीज़ महासचिव **बीके बृजमोहन भाई** को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार **डॉ योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण** के साहित्यिक योगदान को याद किया गया।
मुख्य अतिथि **राज्य मंत्री श्यामवीर सैनी** ने विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ की हिंदी सेवा को भारत का गौरव बताया। विशिष्ट अतिथि **राजयोगिनी बीके मंजू दीदी** ने आत्म स्वरूप में रहकर परमात्मा तक पहुँचने की **राजयोग विधा** की जानकारी दी, जिसे उन्होंने इंसान से देवता बनने के मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम का समापन **कवि सम्मेलन** से हुआ, जिसमें रुड़की के वरिष्ठ कवि **सुरेंद्र कुमार सैनी** ने अपनी ग़ज़ल प्रस्तुत की। इस अवसर पर देहरादून, छत्तीसगढ़, करनाल, मुजफ्फरनगर सहित विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों और ब्रह्माकुमारीज़ के भाई-बहनों ने भाग लिया।
उपस्थित साहित्यकारों ने इस संस्कृत और हिंदी के मिलन को एक **ऐसा यज्ञ** बताया, जिसकी सुगंध देश-दुनिया में लंबे समय तक बनी रहेगी। यह कार्यक्रम न केवल हिंदी साहित्य को प्रोत्साहित करने का अवसर था, बल्कि भाषा और संस्कृति के संवर्धन में एक ऐतिहासिक संगम के रूप में याद रखा जाएगा।