डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
पन्ना केवल हीरे के लिए ही प्रसिद्ध नही है,बल्कि यह उस महारास के लिए भी प्रसिद्ध है,जो द्वापर युग से होता चला आ रहा है।मध्यप्रदेश की हीरा नगरी पन्ना में प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन होता है। शरद पूर्णिमा की रात्रि में करीब एक बजे बंगलाजी से श्रीजी की सवारी ब्रह्म चबूतरे में लाई जाती है। रातभर महारास का उल्लास चलता है, ब्रह्म चबूतरे में पांच दिनों तक यह सवारी रुकती है। इस दौरान पांच दिन तक गरबा सहित विविध धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते है और शरद पूनम की चांदनी रात में प्राणनाथ का सौंदर्य देखते ही मनमोहक हो जाता है।
जब चांद पूरा खिला हो,तभी ब्रह्म चबूतरे पर बने बंगलाजी मंदिर से श्रीजी की सवारी को हजारों सुन्दरसाथ नाचते-गाते, गरबा खेलते हुए रासमंडल मेंं पधारते है। इस अवसर पर प्रणामी धर्मावलंबी रास उत्सव का आनंद लेते हुए भक्ति रस के अमृत का पान करते है। महोत्सव में देश-विदेश से हजारों सुंदरसाथ आते हैं। महामति प्राणनाथ ने संवत् 1740 में खेजड़ा मंदिर परिसर में बुंदेलखंड की रक्षा के लिए महाराजा छत्रसाल को विजयादशमी के दिन वरदानी तलवार सौंपी थी और वीरा उठाकर संकल्प कराया था कि जब तक जीतकर नहीं आओगे तब तक मैं यहीं ठहरुंगा। परिणाम यह रहा कि महाराजा छत्रसाल ने पूरे बुन्देलखंड पर विजय प्राप्त कर ली और अपना साम्राज्य स्थापित कर पन्ना को राजधानी बनाया था।
उन्होंने औरंगजेब के सरदारों को धूल चटा दी थी।इस संदर्भ में तेरस की सवारी का आयोजन पहली बार बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल ने किया था। सद्गुरु के सम्मान की प्रतीक इस सवारी को लेकर मान्यता है कि जब बुंदेलखंड को चारों तरफ से औरंगजेब के सरदारों ने घेर लिया था तब महामति प्राणनाथ ने महाराजा छत्रसाल को अपनी चमत्कारी दिव्य तलवार देकर विजयश्री का आशीर्वाद देकर कहा था कि हे राजन जब तक तुम अपने दुश्मनों को धूल चटाकर नहीं आ जाते तब तक मैं इसी खेजड़ा मंदिर में ही रुकूंगा। तेरस को जब महाराजा छत्रसाल अपने दुश्मनों पर विजयश्री पाकर कर लौटे तो सद्गुरुमहामति प्राणनाथ को पालकी में बिठाकर अपने कंघों का सहारा देकर प्राणनाथ मंदिर स्थित गुम्मट बंगला (जिसे ब्रह्म चबूतरा भी कहते हैं) लाए थे।प्राणनाथ गुंबट बंगला में अपने 5 हजार सुंदरसाथ के साथ ठहरे थे।
उस समय वे पूर्णिमा की चांदनी रात में सुंदरसाथ के साथ श्रीकृष्ण द्वारा ग्वाल-ग्वालियों के साथ खेले जाने वाले महारास की चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान उनके साथ आए सुंदरसाथ ने महामति प्राणनाथ से अखंड महारास का अनुभव कराने का निवेदन किया। तब पूनम की आधी रात शुरू होने वाली थी। इस पर महामति प्राणनाथ ने पांच हजार सुंदरसाथ के साथ महारास खेलना शुरू किया। यह महारास पांच दिन तक बिना रुके, बिना थके चलता रहा। जिसे द्वापर युग के बाद सबसे बड़ा रास कहा जाता है।तभी से यह महारास हर साल मनाया जा जाता है।पवित्र नगरी पन्ना में अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव के आयोजन को 400 साल पूरे हो चुके हैं। बताया जाता है कि शरद पूर्णिमा महोत्सव का पहला कार्यक्रम संवत् 1740 में हुआ था।
तब महामति प्राणनाथ ने 5 हजार सुंदरसाथ के साथ पूनम की चांदनी रात में अखंड रास के दर्शन कराए थे। चार सौ साल के लंबे सफर में यह महोत्सव नित नई उंचाइयों को छूता जा रहा है। अब भारत के अलावा, ब्रिटेन, कनाड़ा और अमेरिका सहित विश्व के कई देशों से सुंदरसाथ पन्ना पहुंचते हैं। मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारी चिदानन्द शर्मा ने बताया कि वर्ष 1971 में मंदिर में ढाई क्विंटल सोने का कलश चढ़ाया गया था। उस साल सबसे अधिक श्रद्धालु मुक्तिधाम में पहुंचे थे। लेकिन अभी भी प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ जिन्हें सुन्दरसाथ कहते है,जुटती है,हालांकि लोगो की संख्या के हिसाब से उनके ठहरने व खाने पीने की समुचित व्यवस्था नही हो पाती।
शरद पूर्णिमा पर पूरे शहर में श्रद्धालु ही श्रद्धालु नजर आते है। स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी कार्यालयों आदि की छुट्टी कर दी जाती है और सभी जगह ,यहां तक कि लोगो के घरों में भी श्रद्धालुओं को रुकवाया है। तब कोई भी सरकारी भवन ऐसा नहीं बचता जहां श्रद्धालुओं को नहीं रुकवाया गया हो।पन्ना में प्राणनाथ मंदिर ट्रस्ट की स्थापना वर्ष 1961 में लाली शर्मा के प्रयासों से हुई थी। तब वे ट्रस्ट के वाइस चेयरमैन बने थे। इसके बाद प्राणनाथ ट्रस्ट ही गुंबटजी, बंगलाजी, गुरु मंदिर, बाईजू राज मंदिर, खेजड़ा मंदिर और चौपड़ा मंदिर आदि का रख-रखाव कर रहा है। जब ट्रस्ट नहीं था तब यहां आयोजन में आने वाले लोगों के लिए हर प्रकार की व्यवस्था करने में काफी परेशानी होती थी। ट्रस्ट बनने के बाद व्यवस्थाओं में सुधार हुआ है।
श्रद्धालुओं के लिए ट्रस्ट की ओर से आवास व्यवस्था का विस्तार किया गया है। आज यहां आने वाले ज्यादातार श्रद्धालुओं को ट्रस्ट अपने धर्मशालाओं, आवास गृहों आदि में ठहराता है। यहां चलने वाले भंडारे में हर दिन हजारों लोग प्रसाद ग्रहरण कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक हर साल शरद पूर्णिमा के आयोजन में ट्रस्ट करीब 50 लाख रुपए खर्च करता है।देश के विभिन्न प्रांतों सहित विदेश से आए हुए श्रद्धालु सर्वप्रथम पन्ना नगर के धाम मोहल्ला स्थित श्री प्राणनाथ जी मंदिर,श्री गुम्मट जी मंदिर, श्री बांग्ला जी मंदिर, श्री सद्गुरु श्रीधनी दास मंदिर, श्री देव चंद जी मंदिर,श्री बाईजू राज (राधिका मंदिर) मैं पूरी श्रद्धा के साथ शीश नवाते हुए धूमधाम से परिक्रमा शुरू करते हैं।यहां भक्तों का मानना है कि पृथ्वी परिक्रमा से उनको एक सुखद अनुभूति एवं शांति मिलती है।
पवित्र नगरी पन्ना की पवित्र धारा में हजारों की संख्या में देश के कोने-कोने से आए सुंदरसाथ प्रात 5 बजे से चारों मंदिरों की परिक्रमा के साथ पृथ्वी परिक्रमा का शुभारंभ करते हैं। विश्वकल्याण व सांप्रदायिक सद्भाव की इस अनूठी मिसाल को प्रणामी संप्रदाय के संरक्षक प्रणेता महामति श्री प्राणनाथ जी ने लगभग 397 वर्ष पहले इस पृथ्वी परिक्रमा की शुरुआत की जो आज भी अनवरत रूप से जारी है। (लेखक आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ पत्रकार है)