“ट्रंप साहब को नोबेल दे दीजिये: सात युद्ध, सत्तर दावे, और एक सुनहरा सपना.. और क्या चाहिये नोबेल दाता!”

प्रस्तुति: सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार

एक बार की बात है, व्हाइट हाउस के सुनहरे गलियारों में, जहाँ दीवारें सोने की तरह चमकती थीं (या शायद वो सिर्फ ट्रंप साहब का हेयरस्प्रे रिफ्लेक्शन था), हमारे नायक डोनाल्ड जे. ट्रंप बैठे थे। उनके सामने एक विशाल डेस्क, जिस पर एक गोल्ड-प्लेटेड बटन था, जिसे वो “पीस बटन” कहते थे। नहीं, ये न्यूक्लियर लॉन्च बटन नहीं था (हालाँकि दोनों में कन्फ्यूजन होना स्वाभाविक था)। ये बटन कथित तौर पर “दुनिया में शांति लाने” के लिये था। “मैंने सात युद्ध रोके हैं!” ट्रंप साहब ने अपने ट्रेडमार्क अंदाज में, हाथ हवा में लहराते हुए घोषणा की। उनके पीछे खड़ा एक टीवी लगातार उनके पुराने ट्वीट्स का लूप चला रहा था, जिसमें “नोबेल! नोबेल!” की गूंज थी। कमरे में मौजूद एकमात्र अन्य व्यक्ति, उनका वफादार सहायक, जो शायद इंटर्न था, ने पूछा, “सर, सात युद्ध कौन-कौन से हैं?”ट्रंप साहब ने एक गहरी साँस ली, अपनी टाई ठीक की (जो इतनी लंबी थी कि शायद उसका दूसरा सिरा मैक्सिको की दीवार तक जाता था), और बोले, “देखो, ये बहुत ही टेरिफिक युद्ध थे। बहुत बड़े, बहुत खतरनाक। लेकिन मैंने उन्हें रोका। लोग कहते हैं, ‘डोनाल्ड, तुमने दुनिया बचा ली!’ मैंने कहा, ‘थैंक यू, लेकिन मुझे बस नोबेल चाहिए।'”इंटर्न ने हिम्मत जुटाकर फिर पूछा, “लेकिन सर, वो युद्ध कौन से थे? जैसे, कोई नाम, कोई जगह?” ट्रंप साहब ने एक पल के लिए अपनी भौहें सिकोड़ीं, जो शायद उनके चेहरे का सबसे मेहनती हिस्सा थीं। फिर एक जोशीला जवाब आया, “देखो, पहला युद्ध था… उह, मंगल ग्रह और वीनस के बीच। बहुत खतरनाक था, लोग नहीं जानते! मैंने दोनों को फोन किया, कहा, ‘लड़ना बंद करो, ट्रेड डील साइन करो!’ और वो मान गए।”इंटर्न ने अपनी नोटबुक में कुछ लिखने की कोशिश की, लेकिन पेन रुक गया। “मंगल और वीनस? सर, वो तो ग्रह हैं।” ट्रंप साहब ने तपाक से जवाब दिया, “एग्जैक्टली! इसीलिये तो कोई नहीं जानता। मैंने इंटरगैलेक्टिक पीस डील करवाई। नासा वाले मेरे पीछे पड़े हैं, लेकिन मैंने कहा, ‘सॉरी, नोबेल पहले!'”दूसरा युद्ध, ट्रंप साहब के मुताबिक, “टिकटॉक और ट्विटर” के बीच का था। “लोग कहते थे, डोनाल्ड, ये सोशल मीडिया है, युद्ध नहीं। मैंने कहा, ‘नहीं, ये साइबर वॉर है!’ मैंने टिकटॉक को बैन करने की धमकी दी, और ट्विटर को… खैर, ट्विटर तो अब मेरा है, तो वो युद्ध मैंने जीत लिया।” इंटर्न ने पूछा, “लेकिन सर, ये तो दो युद्ध हुए। बाकी पाँच?” ट्रंप साहब ने अपनी कुर्सी पर पीछे की ओर झुकते हुए एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी। “बाकी? ओह, वो तो बहुत सीक्रेट हैं। टॉप सीक्रेट। मैंने नॉर्थ कोरिया को साउथ कोरिया से, रूस को यूक्रेन से, और… उह, कनाडा को मैक्सिको से लड़ने से रोका। लोग नहीं जानते, कनाडा वाले मेपल सिरप की तस्करी करने वाले थे। मैंने जस्टिन ट्रूडो को फोन किया, कहा, ‘जस्टिन, सिरप बंद करो, नहीं तो मैं टैरिफ लगा दूँगा।’ और वो मान गया।”इंटर्न अब पूरी तरह कन्फ्यूज हो चुका था। “सर, लेकिन ये तो डिप्लोमेसी है, युद्ध नहीं।” ट्रंप साहब ने अपनी मेज पर जोर से मुक्का मारा, “डिप्लोमेसी? ये पीसमेकिंग है! मैंने सात युद्ध रोके, और अगर नोबेल कमेटी को अकल होगी, तो वो मुझे अवॉर्ड दे देगी। मैंने सुना है, ओबामा को तो सिर्फ प्रॉमिस करने के लिए मिल गया था। मैंने तो काम कर दिखाया!”बाहर, व्हाइट हाउस के लॉन पर, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी। पत्रकारों ने सवाल दागा, “मिस्टर प्रेसिडेंट, आप कहते हैं सात युद्ध रोके, लेकिन कोई सबूत नहीं है। क्या आप डिटेल्स दे सकते हैं?” ट्रंप साहब ने माइक की ओर झुककर कहा, “सबूत? मेरे शब्द ही सबूत हैं। लोग कहते हैं, ‘डोनाल्ड, तुम सबसे बेस्ट पीसमेकर हो।’ मैंने कहा, ‘थैंक्स, लेकिन नोबेल कहाँ है?'”इसी बीच, नोबेल कमेटी के ऑफिस में, नॉर्वे में, एक कर्मचारी ने ट्रंप साहब का लेटेस्ट ट्वीट पढ़ा: “7 युद्ध रोके! नोबेल कमेटी, तुम कहाँ हो? मेरे पास और युद्ध रोकने का टाइम है!” कर्मचारी ने अपने बॉस से कहा, “सर, ये ट्रंप फिर से शुरू हो गये। क्या करें?” बॉस ने चश्मा उतारते हुए कहा, “इग्नोर करो। अगर हमने इन्हें नोबेल दे दिया, तो ये दावा करेंगे कि इन्होंने आठवाँ युद्ध भी रोका—शायद चाँद और सूरज के बीच!”और इस तरह, ट्रंप साहब का नोबेल नाटक चलता रहा। हर दिन एक नया दावा, हर ट्वीट में एक नया युद्ध। दुनिया शायद ये कभी न जान पाये कि वो सात युद्ध कौन से थे, लेकिन ट्रंप साहब के लिये एक बात पक्की थी—नोबेल न मिले, तो भी ट्वीट्स की गोल्ड-प्लेटेड ट्रॉफी तो उनकी थी ही!

(नोट: ये सटायर पूरी तरह काल्पनिक और हास्य के लिये है। कृपया इसे इसी रूप में लिया जाये।)

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