पांच अगस्त को धराली क्षेत्र में आई भीषण तबाही को लेकर अब नए तथ्य सामने आए हैं। नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (नीम) और एसडीआरएफ की संयुक्त टीम ने मौके पर पहुंचकर गहन निरीक्षण और ड्रोन सर्वे किया। टीम के सदस्यों दीप साईं और शिवराज पंवार ने बताया कि धराली हादसा न तो बादल फटने से हुआ और न ही किसी ग्लेशियर झील के टूटने से। असल कारण श्रीकंठ ग्लेशियर के बेस क्षेत्र से हुआ विशाल भूस्खलन है।
टीम ने खीर गंगा के उद्गम स्थल तक जाकर अध्ययन किया। वहां किसी भी प्रकार की ग्लेशियर झील नहीं मिली। जांच में स्पष्ट हुआ कि करीब 4800 मीटर की ऊंचाई पर श्रीकंठ पर्वत के बेस से भारी मात्रा में मोरेन और मलबा खिसककर नीचे आया। यह मलबा पानी के साथ तेजी से बहता हुआ धराली तक पहुंचा और तबाही का कारण बना।
विशेषज्ञों के अनुसार यह क्षेत्र पुराना ग्लेशियर क्षेत्र है, जहां बड़ी मात्रा में ग्लेशियर डिपॉजिट मौजूद हैं। यही डिपॉजिट तीन अलग-अलग स्थानों से खिसककर नीचे आए और पानी के तेज बहाव के साथ धराली को बहा ले गए। इस खुलासे के बाद क्षेत्र में फैली विभिन्न अफवाहों पर भी विराम लग गया है।
जिला प्रशासन के निर्देश पर 14 अगस्त को नीम और एसडीआरएफ की सात सदस्यीय टीम धराली से रवाना हुई थी। टीम ने करीब 11 किलोमीटर का अतिदुर्गम रास्ता पार करते हुए 5000 मीटर ऊंचाई पर स्थित भूस्खलन स्थल तक पहुंचकर अध्ययन किया।
गौरतलब है कि नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (उत्तरकाशी) हिमालयी क्षेत्रों में पर्वतारोहण, रॉक क्लाइम्बिंग, ऊंचाई पर ट्रैकिंग और रेस्क्यू अभियानों में विशेषज्ञ माना जाता है। धराली की तबाही के असली कारण का पता लगाने में संस्थान और एसडीआरएफ की संयुक्त टीम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अब प्रशासन इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की रणनीति तय करेगा, ताकि भविष्य में इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं से जान-माल का नुकसान कम किया जा सके।
