कैसे मान लूं कि अब नहीं हो तुम बस दिखाई ही तो नहीं देते…

कैसे मान लूं कि अब नहीं हो तुम बस दिखाई ही तो नहीं देते…

वरना, हर तरफ तो तुम ही तुम हो यह ठंडी हवाएं जब छू कर जाती है मुझे यह फूलों की डालिया जब, झुक झुक आती है मुझ पर आसमान से बरसती बारिश की बूंदे जब जब भीगा जाती है मुझे महसूस होता है इन सबो में तुम्हारा ही स्पर्श मुझे दोपहर में जब सूरज की तेज किरणें तपा देती है मुझे तो ऐसा लगता है मानो आज खफा से हो तुम मुझसे तेज हवाओं से फड़फड़ा ता हुआ मेरा आंचल जब लहरा कर लिपट जाता है मुझसे तो एहसास दिलाता है तुम्हारे आगोश में सिमटी होने का कैसे मान लूं कि अब नहीं हो तुम बस दिखाई ही तो नहीं देते वरना हर तरफ तो तुम ही तुम हो पंचतत्व से बने थे और पंचतत्व में विलीन हो गए इसीलिए शायद इन हवाओं, बारिश की बूंदों, फूलों की छुअन और सूरज की तपन से, अपने होने का एहसास कराते हो तुम कैसे मान लूं कि अब नहीं हो तुम.

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