लोक सभा चुनाव के बहाने भावी सियासत को ‘क्षत्रपों’ में जंग
गुटीय वर्चस्व की जंग से भाजपाइयों के तेवर ढीले
गोपेश्वर। लोक सभा चुनाव के बहाने अब भाजपा के ‘क्षत्रपों’ के बीच भावी सियासत को लेकर सियासी जंग तेज हो गई है। इसके चलते गुटीय बर्चस्व की जंग से भाजपाइयों के तेवर चुनाव में ढीले ही लग रहे हैं।
दरअसल लोक सभा चुनाव के बहाने निकाय, त्रिस्तरीय पंचायत, सहकारिता तथा 227 में होने वाले विधान सभा के चुनावों पर प्रत्याशी बनने को भाजपाई क्षत्रपों की नजरें टिक गई हैं। इसके चलते मौजूदा चुनाव में भाजपा के भावी कर्णधार अपनों से ही दूर होते चले जा रहे हैं। इसके चलते इस बार गुटीय बर्चस्व की जंग से भाजपाइयों के तेवर चुनाव प्रचार में ढीले ही लग रहे हैं।
पहले कांग्रेस गुटीय संघर्ष से जूझती रही। अब यह रोग भाजपा को भी लग गया है। विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस गुटीय संघर्ष से दूर हो चली है किंतु भाजपा में भावी सियासत को बचाने के लिए एक-दूसरे के बीच तखड़ी जंग चल रही है।
बदरीनाथ और थराली विधान सभा क्षेत्र में तो भाजपा ‘त्रिगुट’ में फंसी पड़ी है जबकि कर्णप्रयाग में दो गुटों के बीच द्वंद चल रहा है। बदरीनाथ में भाजपा आला कमान के निर्देश पर हुए ऑपरेशन में कांग्रेस विधायक राजेंद्र सिंह भंडारी को गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में कांग्रेस को अलविदा कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण करनी पड़ी।
गढ़वाल की 14 विधान सभा सीटों में से अब तक बदरीनाथ पर ही राजेंद्र सिंह भंडारी के जरिए कांग्रेस की लाज बची थी। ऑपरेशन लोटस के जरिए भंडारी को भी भाजपा में शामिल कर दिया गया। हालांकि आलाकमान के निर्णय को मूल भाजपाई पचा नहीं पा रहे हैं किंतु इस पर कुछ प्रतिक्रिया देने से भी बच रहे हैं। 222 का विधान सभा चुनाव हार जाने के बाद भाजपा प्रत्याशी रहे महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस के भंडारी विरोधी गुट को भाजपा में शामिल करवा दिया। यहां तक कि उन्हें प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य पदों पर भी आसीन कर दिया गया। मूल भाजपाई इस तरह की कवायद को पचा नहीं पा रहे थे कि अब भंडारी के आने से वे अपनी भविष्य की संभावनाओं को लेकर मुश्किल में फंस गए हैं। हालांकि भंडारी ने अपने समर्थकों को लामबंद कर चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। भाजपा प्रत्याशी अनिल बलूनी के गोपेश्वर में आयोजित रोड शो में भंडारी मौजूद तो रहे ही अपितु अपने कई सदस्यों को भाजपा की सदस्यता दे डाली। इसके बाद उन्होंने समर्थकों की जिलासू, पोखरी तथा गोपेश्वर में बैठकें कर सबको चुनाव प्रचार के लिए राजी करवाया। इससे पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट तथा प्रदेश महामंत्री संगठन अजेय कुमार के नेतृत्व में बदरीनाथ विधान सभा संयोजक गजेंद्र रावत व प्रभारी विनोद कुमार सिंह नेगी की मौजूदगी में भंडारी स्वयं कोर कमेटी और चुनाव प्रबंधन समिति की बैठक में भी भंडारी शामिल रहे। माना जा रहा है कि सभी गुटों में मेलजोल करने के निमित डेमेज कंट्रोल की नीति अपना कर मामले को शांत किया जाता रहा। मूल भाजपाई भविष्य में होने वाले निकाय, सहकारिता तथा त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के साथ 227 में होने वाले विधान सभा चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर संशय में पड़ गए हैं। यही वजह है कि तीनों गुटों में फिलहाल मेल मिलाप नहीं हो पा रहा है। यही चिंता मूल भाजपाइयों को सता रही है कि भाजपा के चरमकाल में भी यदि उन्हें महत्वपूर्ण हदे नहीं मिले तो वर्षों से भाजपा के खेवनहार रहने का उद्देश्य ही निरर्थक होकर रह गया है। कैडर आधारित भाजपा विचारधारा के कार्यकर्ता तो इस पर कुछ नहीं कह रहे हैं। उनका साफ तौर पर कहना है कि वे ‘कमल’ के लिए जी रहे हैं और कमल को ही प्रत्याशी मान कर अनिल बलूनी की जीत की राह प्रशस्त करेंगे।
पूर्व काबिना मंत्री भंडारी ने इस सवाल पर साफ तौर पर कहा कि भाजपा अनुशासित पार्टी है। यहां गुटीय संघर्ष की कोई गुंजाइस नहीं है। इसलिए भाजपा में गुटीय संघर्ष की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। भाजपा के सभी कार्यकर्ता आपसी मेलजोल से काम कर रहे हैं।
थराली विधान सभा सीट भी त्रिगुट में फंसी पड़ी है। देवाल ब्लाक में तो त्रिगुट इस तरह हॉबी हो गया है कि एक-दूसरे से मेल मिलाप तो दूर अपितु निपटाने की कवायद चल रही है। थराली ब्लाक में भी पार्टी दो गुटों के संघर्ष में फंसी है। इसके बावजूद थराली में भी हालातों को नियंत्रित करने के कोई प्रयास होते नहीं दिखाई दे रहे हैं। कर्णप्रयाग भी पार्टी में गुटीय वर्चस्व की जंग चल रही है। इस सीट पर 2 से 3 गुट सक्रिय होकर भविष्य की राह को सुदृढ़ करने में जुटे हुए हैं। इस तरह के हालातों के चलते लोकसभा चुनाव के बहाने क्षत्रपों की सियासी कवायद आम भाजपाइयों के गले नहीं उतर पा रही है। यही वजह है कि मौजूदा लोकसभा चुनाव में गुटीय वर्चस्व की जंग से भाजपाइयों के तेवर ढीले चल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भाजपा प्रदेश नेतृत्व से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक गुटीय बर्चस्व की जंग की खबर न हो। सूत्र बता रहे हैं कि आरएसएस के जरिए कार्यकर्ताओं को चिन्हित किया जा रहा है और इसकी रिपोर्ट भी शीर्ष नेतृत्व से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक भेजी जा रही है। अब देखना यह है कि भाजपा गुटीय वर्चस्व की जंग से किस तरह बाहर निकलती है। फिलहाल तो क्षत्रपों की भावी सियासी रिहर्सल तेवरों के ढीले होने का संकेत दे रही है।