जीएसटी के कानूनी दांवपेंच में अब भी उलझे हैं विधि विशेषज्ञ

नईदिल्ली। रोटी और पराठा दोनों ही आंटा से बनते हैं, फिर दोनों के लिए अलग अलग दरों का जीएसटी कैसे लिया जा सकता है। इस सवाल ने फिर से यह मुद्दा गरमा दिया है। पहले से ही विरोधी और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ सरकार पर यह आरोप लगाते आ रहे हैं कि बिना विचार विमर्श के आनन फानन में इस जीएसटी को लागू कर दिया गया है। इसी वजह से इस किस्म की विसंगतियां बार बार उभरकर आ रही है।

रोटी और पराठा पर यह विवाद वाकई उलझ गया है और इस पर अब तक गुजरात के प्राधिकार के एक फैसले ने इसे और रोचक बना दिया है। गुजरात जीएसटी के अपील प्राधिकार ने यह फैसला सुनाया है कि पैकड या फ्रोजन पराठा और रोटी में फर्क है।

इसके पीछे का तर्क यह दिया गया है कि दोनों को बनाने की विधि और समय में बहुत अंतर है। ऐसे विवाद तब उभर रहे हैं जबकि नये जीएसटी कानून को लागू हुए अब पांच साल बीत चुके हैं। दूसरी तरफ इस फैसले का विरोध करने वाले जानकार यह दलील दे रहे हैं कि रोटी और पराठा के अलावा भी इसी पद्धति से अनेक चीजें बनती हैं। रोटी में भी कई किस्म हैं और यही रसोई का तरीका अलग अलग किस्म के पराठों पर भी लागू होता है।

भारतीय रंधन पद्धति की इन विविधताओं का ख्याल किये बिना ही रोटी को पांच प्रतिशत और पराठा को 18 प्रतिशत के स्लैब में डालना गलता है। इसके पहले तेल पर भी देश में ऐसा ही विवाद उत्पन्न हो चुका है। मेरिको पैराशूट आयल सिर्फ नारियल तेल है या बालों में लगाने का तेल है, यह विवाद रोचक बना था। नेस्ले का किटकैट बिस्कुट है अथवा चॉकलेट, फ्रायम को पापड़ माना जाए या नहीं, ऐसे विवाद कई बार उभरे हैं।

दरअसल इस बार अहमदाबाद के वाडीलाल कंपनी ने अपने आठ किस्म के पराठों को लेकर सवाल उठाये थे। पिछले साल अगस्त माह में तमिलनाडू के प्राधिकार ने डोसा पर 18 प्रतिशत जीएसटी का फैसला सुनाया था जबकि डोसा बनाने के घोल पर सिर्फ पांच प्रतिशत जीएसटी थी। मध्यप्रदेश में रोटी, पराठा, चपाती और खाखरा का विवाद हो चुका है।

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