हुजूर ! कुर्ता-पायजामा पुरानी बात, चुनावी बयार में ‘टोपी ट्रेंड’

कहीं लाल टोपी पर सता संग्राम तो कहीं खास पहाड़ी टोपी बन रही नेताजी की पहचान

  • वोटरों से इमोशनल कनेक्ट के लिए दिल्ली के स्टार प्रचारक भी हुए टोपी के मुरीद
  • टोपी ट्रेंड किसको बनाएगा सरताज, किसका उतरेगा ताज फिलहाल करना होगा इंतजार
देहरादून। एक समय था जब खादी से बना कुर्ता व पायजामा नेताजी की पहचान हुआ करती थी। अक्सर चुनावी मौसम में तो कुर्ता पहने नेताजी शहर की गलियों से लेकर गांव की पगडंडियों को नापते हुए वोटरों के दर पर दस्तक देते हुए देखे जाते। पर समय के साथ सब कुछ बदल रहा है।
उत्तराखंड समेत अन्य पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में नेताजी के पहनावे में हुए इस नए बदलाव की झलक साफ देखी जा सकती है। इस चुनावी बयार में खादी का कुर्ता-पायजामा नहीं बल्कि ‘टोपी’ जबरदस्त ट्रेंड हो रही है। पड़ोसी राज्य उप्र में जहां ‘लाल टोपी’ पर सत्ता संग्राम छिड़ा हुआ है तो उत्तराखंड में ‘पहाड़ी टोपी’ नेताजी की पहचान बन रही है। 
चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशी हो या उनके समर्थक अथवा दिल्ली से पहुंच रहे स्टार प्रचारक सभी के सिर पर पहाड़ी टोपी सजी हुई देखी जा सकती है। इतना जरूर कि डिजायनरों ने पारंपरिक पहाड़ी टोपी को चुनावी मौसम में नया लुक दिया है। अलग-अलग रंग में बनी ये खास टोपियां नेताजी व उनके समर्थकों को खूब भा रही है। पहाड़ी टोपी पहने नेताजी के लुक को देख कर कहा जा सकता है कि ‘इमोशनल कनेक्ट’ के बहाने मतदाताओं के करीब पहुंचने में वह कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं। क्योंकि सियासत में छोटी-छोटी बातों का बड़ा महत्व होता है।
बहरहाल, चुनावी मौसम में खूब ट्रेंड हो रही पहाड़ी टोपी नेताजी को वोटरों के करीब लाने के लिए चर्चा में तो है ही, साथ ही सर्द हवाओं से सिर को गरमाहट भी दे रही है। अब देखने वाली बात यह कि इस विस चुनाव का यह ‘टोपी ट्रेंड’ सियासत के मैदान में किसको सरताज बनाता है और किसका ताज उतरता है।
फिलवक्त इसके लिए आगामी 14 फरवरी को होने वाले मतदान और इसके बाद 10 मार्च को सामने आने वाले चुनाव परिणाम तक का इंतजार करना होगा।

…और इनकी भी अपनी-अपनी अलग टोपी

चुनावी मौसम में वोटरों से इमोशनल कनेक्ट के लिए नेताजी के सिर सजी पहाड़ी टोपी तो ट्रेंड कर ही रही है, साथ ही तमाम राजनीतक दल अपनी-अपनी टोपी पहनकर मतदाताआें के दर पर दस्तक दे रहे हैं। इनमें दिल्ली के सीएम केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की अपनी सफेद टोपी है तो फिर सपा की लाल और बसपा की नीली टोपी।
ऐसे में भला क्षेत्रीय दल उक्रांद भी कहां पीछे रहने वाला है। दल के नेता भी ट्राई क्लर वाली खास टोपी पहनकर वोटर के बीच पहुंच रहे हैं। वहीं कुछ छोटे दलों ने भी अपनी पहचान के लिए खास टोपी बना रखी है।

26 जनवरी को पीएम मोदी ने भी पहनी पहाड़ी टोपी

73वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उत्तराखंड की खास ‘पहाड़ टोपी ‘ पहने हुए नजर आए थे। इस खास टोपी में राज्य पुष्प ब्रह्मकमल बना हुआ था जिसे शुभ संकेत माना जाता है।
बताया गया कि यह खास टोपी मसूरी निवासी व सोहम आर्ट एंड हेरिटेज सेंटर के संचालक समीर शुक्ला द्वारा बनाई गई थी। टोपी में ब्रह्मकमल के अलावा चार रंग की एक पट्टी भी बनाई गई थी। स्थानीय कारीगर बताते हैं कि वैसे तो इस टोपी में भूटिया रिवर्स का कपड़ इस्तेमाल किया जाता है।
यदि यह कपड़ा नहीं मिलता है तो वूलन के लिए ट्वीड का कपड़ भी इस्तेमाल होता है। गरमी के मौसम के लिए खादी के कपड़े से भी यह टोपी तैयार की जाती है। इस टोपी में पहले सिलाई का काम होता है और उसके बाद हाथ से इस पर पट्टी आदि का काम होता है।
प्रधानमंत्री के पहाड़ी टोपी पहने इस लुक को कहीं न कहीं राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव को साधने की कोशिश की रूप में भी देखा गया। क्योंकि पीएम के पहनावे में कोई न कोई मैसेज जरूर होता है।

जनरल रावत को भी पंसद थी काली टोपी

देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ दिवंगत जनरल विपिन रावत भी पहाड़ी टोपी के काफी मुरीद थे। वह जब भी उत्तराखंड आते तो काले रंग की पहाड़ी टोपी पहनना पसंद करते थे। यह उनका पहाड़ की जड़ो से जुड़े रहने का संकेत होता था। जनरल रावत को मरणोपरांत इस गणतंत्र दिवस पर पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

शुभ का संकेत है ‘ब्रह्मकमल’

ब्रह्मकमल उत्तराखंड का राज्य पुष्प है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले इस फूल से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक देश में इस फूल की करीब 61 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें अधिकतर उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती हैं।
पूजा-पाठ के साथ ही इसका इस्तेमाल कई देशी नुस्खों में भी किया जाता है। साथ ही सर्दी के कपड़ में भी इस फूल को रखा जाता है। माना जाता है कि इससे सर्दी के कपड़ खराब नहीं होते हैं।
ब्रह्मकमल फूल अगस्त के महीने में उगता है और नंदा अष्टमी को लेकर इस फूल का खास महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि रामायण में लक्ष्मण के मूर्छित होने के बाद इलाज और ठीक होने पर देवताओं ने स्वर्ग से जो फूल बरसाए वह ब्रहमकमल ही थे।

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