खुशियों का पैगाम बांटता बिहू, जीवन का आधार भी है यह पर्व

गुवाहाटी। बिहू, असम के जनजीवन से जुड़ा पारंपरिक लोक पर्व है। असम के लोगों के लिए बिहू का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही, साथ ही यह उनके जीवन का आधार भी है।

 

बिहू मनाने की परंपरा सबसे पहले कब शुरू हुई, इसका कहीं कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। इतिहासकार मानते हैं कि ईसा से करीब साढ़े तीन हजार साल पहले इसका आयोजन शुरू हुआ होगा। बिहू शब्द डिमासा जनजाति की भाषा से लिया गया है।

असम में बिहू पर्व, वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। इस प्रकार यहां रंगाली बिहू, भोगाली बिहू और कंगाली बिहू मनाए जाते हैं, जो तीन ऋतुओं के प्रतीक हैं। पारंपरिक असमिया समाज मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। इसलिए तीनों बिहू, कृषि पर्व हैं, जिन्हें लोग धर्म और जाति के भेदभाव को भूलकर हर्षोंल्लास से मनाते हैं।

रंगाली बिहू : इस समय बसन्त ऋतु अपने चरम पर होती है। रंगाली बिहू अप्रैल माह के मध्य में मनाया जाता है। जहां पंजाब और हरियाणा के किसान सर्दियों की फसल काट लेने के बाद बैसाखी पर्व मनाते हैं, वहीं असम में रंगाली बिहू मनाया जाता है। असम में यह पर्व नववर्ष का प्रारंभ और कृषि सीजन की शुरुआत को दर्शाता है।

रंगाली बिहू के पहले दिन लोग प्रार्थना, पूजा और दान करते हैं। लोग इस दिन नदियों और तालाबों में पवित्र स्नान करते हैं और कहीं-कहीं तो लोग अपने पशुओं को भी नहलाते हैं। सभी बच्चे और बड़े इस दिन नए कपडे पहनते हैं। यह त्योहार हफ्तेभर तक मनाया जाता है।

भोगाली बिहू : माघ या भोगाली बिहू, 14 जनवरी यानी मकर संक्रांति से शुरू होता है। सबसे पहले अग्नि देवता की पूजा की जाती है। यह मूल रूप से फसल की कटाई का त्योहार है। इस समय कृषि कार्य से जुड़े हुए लोगों को भी आराम मिलता है और वे रिश्तेदारों के घर जाते हैं। इस बिहू को भोगाली इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस दौरान खान-पान धूमधाम से होता है।

इस दौरान चिवड़ा, नारियल के लड्डू और भुने हुए अनाज के मिश्रण से तिल पीठा, घिला पीठा जैसे पकवान तैयार किये जाते हैं। साथ ही, मछली और मांस से बना भोजन परोसा जाता है। रात में सभी लोग मिलकर बड़े चाव से भोज भात खाते हैं।

बदलते वक्त के साथ शहरों में बिहू पर्व का स्वरूप बदला है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी पुरानी परंपरा के तहत ही बिहू पर्व का आयाजन किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से भोज देने की परंपरा है।

काति बिहू : यह पर्व अक्टूबर के महीने में मनाया जाता है। काति बिहू के दिन किसान के खलिहान खाली रहते हैं। इसीलिए यह महाभोज या उल्लास का पर्व न होकर प्रार्थना और ध्यान का दिन होता है। चूंकि धान असम की प्रधान फसल है। इसलिए धान लगाने के बाद जब फसल में अन्न लगना शुरू होता है उस समय नए तरह के कीड़े फसल को नष्ट कर देते हैं। इससे बचाने के लिए कार्तिक महीने की संक्रांति के दिन शुरू होता है काति बिहू। इस बिहू को काति इसलिए कहा गया है कि एक तो उत्सव कार्तिक के महीने में मनाया जाता है, दूसरा इस समय फसल हरी-भरी नहीं होती है।

काति बिहू को असमिया लोग लक्ष्मी पूजा का दिन मानते हैं। इस दिन सुबह सवेरे लोग नहा धोकर पूजा-अर्चना करते हैं। अपने अपने आंगन में तुलसी का पौधा रोपते हैं। फिर सभी लोग मिलकर जलपान खाते हैं। इसमें दही, चूढ़ा और गुड के साथ ही नारियल के लडडू और तिल पीठा, बरपीठा इत्यादि शामिल होते हैं। शाम को घर के आंगन में दीया जलाते हैं और आसपास के बच्चों को प्रसाद देते हैं। इसके बाद खेत में दिया जलाने के लिए जाते हैं। कई जगहों पर यह गांव का सामूहिक आयोजन होता है। जिसमें गांव के सभी लोग उत्साह से भाग लेते हैं और खेत के रास्ते में दीए जलाए जाते हैं और खेतों में उंचे बांस के उपर केले के तने से बने सांचे के उपर दीए रखकर खेतों के इर्द-गिर्द जलाए जाते हैं जिसे आकाशबंती कहते हैं।

अक्टूबर के महीने में कीट पतंगों बहुत ज्यादा होते हैं जो फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इस प्रकार अपनी फसल को नुकसान से बचाने के लिए ही दीए लगाए जाते हैं। मान्यता है कि आकाशबंती लगाने से वातावरण शुद्ध हो जाता है और कीट पतंगे मर जाते हैं।

इस प्रकार देखा जाए तो रंगाली और भोगाली बिहू की तरह धूम भले ही काति बिहू में नहीं होती लेकिन धार्मिक और वैज्ञानिक दष्टिकोण से देखें तो यह त्यौहार सादगीभरा होने के बावजूद काफी अनूठा लोकपर्व है।तीनों प्रकार के बिहुओं का सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक महत्त्व है। बिहू उत्सव में शामिल होकर असमिया भावनाओं को महसूस किया जा सकता है।

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