करवा चौथ, पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था पहला करवा चौथ व्रत 

सुहाग की रक्षा को करवाचौथ व्रत कर रही महिलाएं

  • योग्य वर की कामना के लिए अविवाहित कन्याएं भी रखने लगी व्रत 
देहरादून। करवाचौथ का व्रत सुहागिनों महिलाएं पूरी श्रद्धा से रखती है। कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती है और पानी तक का भी सेवन नहीं करती है। निर्जला व्रत रखकर पति की दीघायु की प्रार्थना करती है।
करवाचौथ व्रत की परंपरा देवताओं के समय से चली आ रही है, जो अब आधुनिक दौर में इसका क्रेज बढ़ता जा रहा है। पहाड़ के दूर-दराज क्षेत्रों में पहले करवा चौथ नहीं मनाया जाता था, लेकिन आधुनिकता के दौर में अब करवाचौथ पहाड़ के गांव-गांव में मनाया जाने लगा है।
शहरों की देखादेखी कर आज की युवा पीढ़ी द्वारा करवाचौथ व्रत को गांवों तक मनाया जाने लगा है। एक पौराणिक कथा के अनुसार सबसे पहले करवाचौथ का व्रत मां पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था।
इसी व्रत से उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई थी। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर सुहागिन मलिाएं पति की लंबी आयु की कामना करती है।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करकचतुर्थी (करवा चौथ) व्रत करने का विधान है। व्रत की विशेषता यह है कि पहले से केवल सौभाग्यवती ही करवा चौथ का व्रत रखती है।
हालांकि अब कई जगह अविवाहित कन्याएं भी योग्य वर की कामना से या विवाह सुनिश्चित होने के बाद होने वाले पति की शुभेच्छा के कारण ये व्रत करने लगी हैं। यह विश्वास किया जाता है कि करवाचौथ का व्रत कर उसकी कथा सुनने से विवाहित महिलाओं के सुहाग की रक्षा होती है और परिवार में सुख, शांति एवं समृद्धि आती है।
महाभारत में श्रीकृष्ण ने भी करवाचौथ के महात्म्य के बारे में बताया है। इस बारे में एक कथा भी सुनाई जाती है। इस कथा के अनुसार कृष्ण जी से करवाचौथ की महिमा को समझ कर द्रौपदी ने इस व्रत को रखा, जिसके फलरूप ही अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों सेना को पराजित कर विजय हासिल की थी।
ऐसी मान्यता है कि करवाचौथ की परंपरा देवताओं के समय से चली आ रही है। कथा के अनुसार एक बार देवताओँ और दानवों के युद्ध के दौरान देवों को पराजय से बचाने के लिए ब्रह्माजी ने उनकी पत्नियों को व्रत रखने का सुझााव दिया। इसे स्वीकार करते हुए इंद्रांणी ने इंद्र के लिए और अन्य देवताओँ की पत्नियों ने उनके लिए निरहार, निर्जल व्रत किया।
परिणाम स्वरूप देव विजयी हुए और इसके बाद ही सभी देव पत्नियों ने अपना व्रत खोला। उस दिन कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी थी और आकाश में चांद निकल आया था।
माना जाता है कि तभी से करवाचौथ के व्रत के परंपरा शुरुआत हुई। इसके अलावा यह भी बताया जाता है कि शिवजी को प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने भी इस व्रत को किया था। इसी तरह लक्ष्मी जी ने भी विष्णु जी के बलि के द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद इस व्रत को किया और उन्हें मुक्ति दिलाई थी।
महाभारत काल में इस वत का जिक्र आता है और पता चलता है कि गांधारी ने धृतराष्ट्र और कुंती ने पाण्डु के लिए इस व्रत को किया था।  देवताओं के समय से चल रहा करवा चौथ व्रत आज के दौर में काफी प्रचलित हो गया है। इस व्रत को सभी महिलाएं श्रद्धापूवर्क व उत्साह से मनाते हैं।

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