कोलकाता में इन दिनों एक हिंदी नाटक **‘हे राम’** चर्चा के केंद्र में है। शीर्षक भले ही गांधीजी के अंतिम शब्दों की याद दिलाता हो, लेकिन यह नाटक पूरी तरह नाथूराम गोडसे के दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द बुना गया है। नाटक का मंचन बंगाल के नदिया जिले की चर्चित नाट्य संस्था **चाकदह नाट्यजन** ने किया है, जो प्रायः बांग्ला नाटक प्रस्तुत करती है। ‘हे राम’ उनका दूसरा हिंदी नाटक है; इससे पहले वे ‘मंटो मरा नहीं’ का सफल मंचन कर चुके हैं।
करीब एक घंटे के इस नाटक का निर्देशन जाने-माने रंगकर्मी **सुमन पाल** ने किया है। 20 नवंबर 2025 को इसका पहला शो हुआ था, जिसके बाद लगातार हो रहे प्रदर्शनों ने इसे चर्चा में ला दिया है।
कहानी की शुरुआत उस रात से होती है, जब **नाथूराम गोडसे** को फांसी दी जानी है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, गोडसे को 15 नवंबर 1949 को अंबाला सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी। नाटक में चार पात्र हैं, जिनमें मुख्य रूप से गोडसे (अक्षय नारायण झा), गांधी (शुभाशीष राय) और चौकीदार (अभिषेक दे) हैं। लेखन भी अक्षय नारायण झा और अभिषेक दे ने किया है।
नाटक का सबसे प्रभावशाली दृश्य वह है, जब फांसी के बाद एक काल्पनिक संवाद में गोडसे और **महात्मा गांधी** आमने-सामने होते हैं। गोडसे गांधी पर देश विभाजन और हिंदुओं की उपेक्षा का आरोप लगाता है और अपने कृत्य पर कोई पछतावा न होने की बात कहता है। इसी संवाद के माध्यम से नाटक आज के भारत में गोडसे के महिमामंडन और गांधी की विरासत पर चल रही बहस को मंच पर जीवंत करता है।
अभिनय की दृष्टि से शुभाशीष राय ने गांधी की भूमिका में गहराई दिखाई, वहीं अक्षय नारायण झा ने गोडसे के किरदार को प्रभावी ढंग से निभाया। प्रकाश-सज्जा विप्लव मंडल और संगीत मोहब्बत शेख का रहा, जिसने प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया।
‘हे राम’ केवल ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि समकालीन भारत के वैचारिक संघर्षों को भी दर्शाता है।