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बिहार फिर वोट कर रहा है: वही चेहरे, नए वादे, पुराने झूठ

क्योंकि बिहार में चुनाव बदलते हैं… पर कुछ और नहीं।
आफरीन हुसैन

भारत हमेशा चुनावी मोड में रहता है
एक ऐसा देश जहाँ लोकतंत्र कभी सोता नहीं, बस रैलियों के बीच ऊँघता है।
और अब, जब बिहार एक और हाई-वोल्टेज चुनावी ड्रामे में प्रवेश कर रहा है,
तो एक सवाल नारेबाज़ी से ज़्यादा गूंज रहा है:
क्या ये सच में सुशासन का चुनाव है, या फिर जातिगत गणना का नया संस्करण?

सच कहें तो, बिहार के चुनाव हमेशा घोषणापत्रों से कम और गणित से ज़्यादा जुड़े रहे हैं
जातिगत गणित से।
इस बार “अत्यंत पिछड़ी जातियाँ” यानी EBC वर्ग असली निर्णायक बन गए हैं।
महागठबंधन की स्थिति डगमगाई हुई है,
क्योंकि ये वर्ग लंबे समय से उससे दूरी बनाए हुए हैं।
क्यों?
क्योंकि बिहार में वादे सस्ते हैं, और सत्ता बाँटने का खेल उससे भी सस्ता।

उधर बीजेपी आत्मविश्वास से भरी दिखती है
पर क्या उसे इतना यक़ीन होना चाहिए?
एक ऐसे राज्य में जहाँ 17% आबादी मुसलमान है,
14% से ज़्यादा यादव हैं,
और 35% से ज़्यादा पिछड़ा व अत्यंत पिछड़ा वर्ग है —
वहाँ ज़रा-सी निष्ठा में हिलावट सत्ता के समीकरण पलट सकती है।

आइए वो सवाल पूछें जो टीवी बहसों में कोई नहीं पूछता:

क्या “सबसे पिछड़े” अब इतने समझदार हो चुके हैं कि
मंदिर और जाति की राजनीति से ऊपर सोच सकें?

क्या नीतीश कुमार के पुराने गठबंधन के नुस्खे अब भी चलेंगे,
या अब उनके पास न साथी बचे हैं, न साख?

अगर तेजस्वी यादव बदलाव का चेहरा हैं,
तो क्या बिहार का युवा वाकई प्रेरित है —
या फिर वंशवाद के déjà vu (पहले से देखे दृश्य) से बस थक चुका है?

2020 में एनडीए मुश्किल से 125 सीटें जीत पाई थी —
बहुमत की रेखा से बस ऊपर।
महागठबंधन भी 110 सीटों के साथ पीछे नहीं था।
ये जनादेश नहीं था — ये तो फोटो फिनिश थी।
इस बार महज़ 2% वोट स्विंग भी सत्ता के महलों को हिला सकता है।

पर असली विडंबना ये है:
हर बिहार चुनाव को “ऐतिहासिक” कहा जाता है।
हर परिणाम “राष्ट्रीय राजनीति को नया मोड़” देने वाला बताया जाता है।
फिर भी कुछ नहीं बदलता।
सड़कें टूटी रहती हैं, नौकरियाँ गायब रहती हैं,
और वादे पार्टी घोषणापत्रों में वैसे ही चमकते रहते हैं —
एक ऐसी फिक्शन किताब की तरह जिसे बिहारी कई बार पढ़ चुके हैं।

एनडीए कहेगी कि “विकास हर जगह दिख रहा है।”
पर कहाँ?
पटना से निकलती प्रवासी ट्रेनों में?
टूटे स्कूलों में?
या उन शहरों में जहाँ बिहार का युवा
किसी और के राज्य में सम्मान खोजता है?

और महागठबंधन?
वो गरीबों और पिछड़ों की आवाज़ होने का दावा करते हैं।
पर क्या वो माइक बंद होने के बाद भी इन आवाज़ों को सुनते हैं?
या ये भी “नारा समाजवाद” का नया संस्करण है,
जहाँ नेता गरीबों के साथ तभी बैठते हैं जब कैमरे चालू हों?

और फिर हैं प्रशांत किशोर —
रणनीतिकार से “मसीहा” बने व्यक्ति,
जिनका जन सुराज आंदोलन नया मोड़ लाया है।
क्या वो राजनीति सुधारने आए हैं —
या बस महत्वाकांक्षा को नया पैकिंग दे रहे हैं?
बिहार ने कई सुधारकों को देखा है —
ज़्यादातर आख़िरकार नेता ही बन गए।

जैसे-जैसे चुनावी तापमान बढ़ रहा है,
सवाल और गहराते जा रहे हैं:

क्या ये सचमुच एनडीए बनाम महागठबंधन की लड़ाई है,
या फिर बीते असफलताओं और आने वाली अनिश्चितताओं की दौड़?

अगर सत्ता विरोधी लहर है,
तो क्या वो “मोदी मैजिक” को मात दे पाएगी?

या फिर मतदाता, हमेशा की तरह,
बदलाव की जगह स्थिरता — और उम्मीद की जगह डर को in चुनेंगे?

जो भी हो, एक सच्चाई अटल रहेगी:
बिहार सिर्फ़ सरकार नहीं चुन रहा
वो अपनी प्रासंगिकता चुन रहा है।
देखे जाने का हक़,
सिर्फ़ गिने जाने का नहीं।

तब तक रैलियाँ गूंजेंगी,
वादे बढ़ेंगे,
और मतदाता
भारतीय लोकतंत्र के असली दार्शनिक
मुस्कुराएँगे।
क्योंकि उन्होंने सब देखा है।
और शायद, इस बार,
वो सबको चौंका दें।

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