बांग्लादेश और पाकिस्तान की गलबहियों के पीछे पूर्वोत्तर भारत को अस्थिर करने की चीनी साजिश

विशेष रिपोर्ट: प्रस्तुति- सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार

बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच हाल के समझौतों, विशेष रूप से राजनयिक और आधिकारिक पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा-मुक्त यात्रा की सुविधा ने भारत के लिये सुरक्षा और भू-राजनीतिक चिंताओं को जन्म दिया है। यह समझौता, जो ढाका में पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी और बांग्लादेश के गृह मामलों के सलाहकार जहांगीर आलम चौधरी के बीच हुआ, दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य और व्यापारिक सहयोग का प्रतीक है। साथ ही, बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों जैसे जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव में वृद्धि और ड्रेस कोड जैसे रूढ़िवादी कदमों की चर्चा ने इस आशंका को बल दिया है कि यह सब एक बड़े भू-राजनीतिक खेल का हिस्सा हो सकता है, जिसमें चीन की भूमिका संदिग्ध है। क्या यह सब भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेष रूप से असम, को अस्थिर करने और भारत से अलग करने की एक दीर्घकालिक चीनी साजिश का हिस्सा है? प्रस्तुत है एक विश्लेषण।
बांग्लादेश-पाकिस्तान नजदीकी: एक नया नेक्सस
शेख हसीना की सरकार के दौरान बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ दूरी बनाये रखी थी। पाकिस्तानी राजनयिकों पर कड़ी निगरानी थी, और व्यापारिक प्रतिबंधों के कारण दोनों देशों के बीच सीधा व्यापार सीमित था। हालांकि, मोहम्मद यूनुस के अधीन अंतरिम सरकार के समय बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ कई प्रतिबंधों को हटा दिया है। इनमें वीजा नियमों में ढील, सीधी उड़ानों की बहाली, और समुद्री मार्गों का पुनर्जनन शामिल है। इसके अतिरिक्त, बांग्लादेशी सेना के वरिष्ठ जनरल की पाकिस्तान यात्रा और वहां के सेना प्रमुख से मुलाकात ने सैन्य सहयोग की संभावनाओं को और बढ़ा दिया है।

प्रमुख बिंदु:
वीजा-मुक्त समझौता: यह समझौता पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी (आईएसआई) के अधिकारियों को बांग्लादेश में आसान पहुंच प्रदान करता है, जिससे भारत-विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
सैन्य सहयोग: दोनों देशों के बीच पुलिस प्रशिक्षण, आतंकवाद विरोधी रणनीतियों, और मानव तस्करी जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की बात हो रही है, जो भारत के लिए खतरनाक हो सकता है।
कट्टरपंथी तत्वों का उदय: बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों का प्रभाव बढ़ रहा है, जिनका पाकिस्तान से ऐतिहासिक संबंध रहा है। यह भारत के पूर्वोत्तर में उग्रवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है।

चीन की भूमिका: एक दीर्घकालिक रणनीति
चीन का बांग्लादेश में बढ़ता प्रभाव कोई नई बात नहीं है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत चीन ने बांग्लादेश में बुनियादी ढांचों, बंदरगाहों और ऊर्जा परियोजनाओं में भारी निवेश किया है। ढाका में चीनी-वित्त पोषित परियोजनाएं, जैसे चटगांव बंदरगाह और पद्मा सेतु, क्षेत्र में चीन की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करती हैं। इस संदर्भ में, बांग्लादेश-पाकिस्तान की नजदीकी को चीन की एक बड़ी रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है, जिसके निम्नलिखित उद्देश्य हो सकते हैं:
1. भारत को घेरना: चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के तहत, वह भारत को दक्षिण एशिया में घेरने की कोशिश कर रहा है। बांग्लादेश और पाकिस्तान की नजदीकी से भारत की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर दबाव बढ़ सकता है।
2. पूर्वोत्तर भारत को अस्थिर करना: असम, मेघालय, त्रिपुरा, और मिजोरम जैसे राज्य, जो बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं, पहले से ही घुसपैठ, तस्करी, और उग्रवादी गतिविधियों से प्रभावित हैं। यदि बांग्लादेश में पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथी तत्व मजबूत होते हैं तो यह पूर्वोत्तर में अलगाववादी आंदोलनों को हवा दे सकता है।
सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर खतरा: सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे “चिकन नेक” के रूप में जाना जाता है, पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ने वाला एक संकीर्ण गलियारा है। बांग्लादेश और चीन की संयुक्त रणनीति इस क्षेत्र को अस्थिर कर सकती है, जिससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
आर्थिक और सैन्य निर्भरता: चीन बांग्लादेश को आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान कर उसकी अपने ऊपर निर्भरता बढ़ा रहा है। यह पाकिस्तान के साथ मिलकर एक त्रिकोणीय गठजोड़ बना सकता है, जो भारत के लिए क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ सकता है।

भारत के लिए खतरे
सुरक्षा चुनौतियां:
घुसपैठ और तस्करी: वीजा-मुक्त समझौते से पाकिस्तानी खुफिया एजेंटों की बांग्लादेश में आवाजाही बढ़ सकती है, जिससे असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में घुसपैठ और ड्रग्स तस्करी बढ़ सकती है।
उग्रवाद का खतरा: बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठनों का प्रभाव बढ़ने से पूर्वोत्तर के उग्रवादी समूहों, जैसे अल्फा-आई, को समर्थन मिल सकता है।
सैन्य गठजोड़: बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग भारत की पूर्वी सीमा पर दबाव बढ़ा सकता है, खासकर तब जब चीन इस गठजोड़ को हथियारों और तकनीकी सहायता की आपूर्ति प्रदान करे।

आर्थिक प्रभाव:
– बांग्लादेश भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है, जिसका 2023 में निर्यात 94.3 करोड़ डॉलर था। यदि बांग्लादेश पाकिस्तान और चीन की ओर झुकता है तो भारत का व्यापारिक प्रभाव कम हो सकता है।
– चिकित्सा पर्यटन, जो भारत के लिए 500 अरब टका का राजस्व उत्पन्न करता है, प्रभावित हो सकता है, यदि बांग्लादेशी नागरिक अन्य देशों की ओर रुख करते हैं तो।

सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव:
– बांग्लादेश में रूढ़िवादी नीतियों, जैसे ड्रेस कोड, का बढ़ना भारत के साथ साझा बंगाली सांस्कृतिक मूल्यों को कमजोर कर सकता है। यह भारत-बांग्लादेश सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रभावित कर सकता है।

पाकिस्तान-चीन संबंध: पाकिस्तान चीन का निकटतम सहयोगी है, और दोनों देश भारत के खिलाफ संयुक्त रणनीति अपनाते रहे हैं। बांग्लादेश को इस गठजोड़ में शामिल करना चीन के लिए भारत को घेरने का एक रणनीतिक कदम हो सकता है।
आर्थिक निर्भरता: बांग्लादेश में चीनी निवेश ने उसे आर्थिक रूप से बीजिंग पर निर्भर बनाया है। यह निर्भरता बांग्लादेश को चीन की भू-राजनीतिक रणनीतियों के लिए अधिक अनुकूल बना सकती है।
सैन्य उपस्थिति: चीन बांग्लादेश को सैन्य उपकरण, जैसे पनडुब्बियां और युद्धपोत, प्रदान कर रहा है। यह भारत के लिए हिंद महासागर में एक नई चुनौती पैदा कर सकता है।

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