प्रवासी मजदूरों पर बढ़ते हमले ‘नई फासीवादी राजनीति’ का हिस्सा: नजीब कुरैशी

देश के विभिन्न हिस्सों में प्रवासी मजदूरों पर हो रहे हमलों को “फासीवादी रुझानों” का हिस्सा बताते हुए राजमिस्त्री मजदूर रेजा कुली एकता यूनियन के राज्य उपाध्यक्ष नजीब कुरैशी ने केंद्र सरकार की आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियाँ न केवल देश की अर्थव्यवस्था को संकट में डाल रही हैं, बल्कि समाज में डर और विभाजन का माहौल भी पैदा कर रही हैं।

आर्थिक संकट और प्रवासी मजदूरों को निशाना

प्रेस बयान में कुरैशी ने कहा कि पिछले 11 वर्षों में आर्थिक संकट लगातार गहराया है, खासकर लघु और मंझोले उद्योगों पर। उन्होंने कहा, “आज देश के सबसे बड़े रोजगारदाता – छोटे उद्योग – या तो बंद हो चुके हैं या बीमार हालत में हैं। छोटे व्यापारी भारी कर्ज में डूबे हुए हैं और मजदूर बड़ी संख्या में बेरोजगार हो रहे हैं।”

उनका दावा है कि इस संकट के मूल में सरकार की वह आर्थिक नीति है जो सिर्फ कुछ गिने-चुने कॉर्पोरेट घरानों के हित में काम करती है। इस नीति से पैदा हुए असंतोष से जनता का ध्यान भटकाने के लिए प्रवासी मजदूरों को टारगेट किया जा रहा है। कुरैशी ने आरोप लगाया, “प्रवासी मजदूरों को समाज का दुश्मन बताकर उनकी छवि बिगाड़ी जा रही है। ये सब एक सोची-समझी साजिश है।”

‘आतंकित करो – दबाव बनाओ – नियंत्रित करो’ की रणनीति

कुरैशी के अनुसार प्रवासी मजदूर, जो दूसरे राज्यों से आकर सस्ते में काम करते हैं, मालिकों के लिए मुनाफे का बड़ा जरिया हैं। लेकिन यही मजदूर जब अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें दबाने के लिए उन पर हमले कराए जाते हैं। “इन मजदूरों के पास न न्यूनतम वेतन की गारंटी है, न श्रम कानून का संरक्षण,” उन्होंने कहा। “शोषण को बनाए रखने के लिए फासीवादी सोच के लोग इन्हें निशाना बना रहे हैं।”

अस्मिता की आड़ में हमले

प्रेस बयान में यह भी उल्लेख किया गया कि महाराष्ट्र में ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर हिंदीभाषी लोगों को, कर्नाटक में कन्नड़ विरोधी माहौल के तहत हिंदीभाषियों को, और कई भाजपा शासित राज्यों में बांग्लाभाषी प्रवासी मजदूरों को योजनाबद्ध तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।

कुरैशी ने इस नीति की तुलना अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रवासी विरोधी नीतियों और हिटलर की यहूदी विरोधी मुहिम से की। उन्होंने कहा, “जिन प्रवासी मजदूरों के दम पर देश की अर्थव्यवस्था चलती है, आज उन्हीं को डराकर नियंत्रित किया जा रहा है।”

नागरिकता विवाद और जबरन ‘पुशबैक’

यूनियन नेता ने आरोप लगाया कि अब भारत के नागरिकों को भी ‘घुसपैठिया’ घोषित कर बांग्लादेश भेजा जा रहा है। उन्होंने उदाहरण दिया कि पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के एक कचरा बीनने वाले मजदूर को मुंबई से जबरन बांग्लादेश भेज दिया गया, जबकि उनके पास नागरिकता के कागजात थे।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की नागरिकता नीति, जो हिन्दुओं को सुरक्षित बताती है, वह भी धोखा साबित हो रही है। “उड़ीसा के नवरंगपुर जिले से 10 बांग्लाभाषियों को पकड़ा गया, जिनमें से 9 हिंदू थे,” उन्होंने कहा।

चुनाव आयोग और एनआरसी पर सवाल

कुरैशी ने चुनाव आयोग पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि बिहार में नागरिकता साबित करने के लिए मतदाताओं को दो हिस्सों में बाँटा गया है – 2003 के पहले और बाद के मतदाता। बाद के मतदाताओं को नागरिकता के दस्तावेज पेश करने होंगे, जिससे लाखों गरीब और अशिक्षित लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।

उन्होंने कहा, “असम में 19 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। अब बिहार में भी करीब 35 लाख लोगों के नाम हटाए जाने की आशंका है। ये आंकड़े सरकार के दावे से मेल नहीं खाते। यह सीधे तौर पर नागरिकता कानून को पीछे के दरवाजे से लागू करने की साजिश है।”

अमीरी-गरीबी की खाई और कॉर्पोरेट हित

प्रेस बयान के अंत में नजीब कुरैशी ने देश में बढ़ती आर्थिक असमानता पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि एक ओर अडानी की वार्षिक आय 8.4 लाख करोड़ रुपये है, जबकि देश के 30 प्रतिशत लोग प्रतिदिन केवल 100 रुपये कमाते हैं। “इस गहरी खाई को छिपाने के लिए सरकार घुसपैठियों और प्रवासी मजदूरों के नाम पर समाज को बांट रही है,” उन्होंने आरोप लगाया।


निष्कर्ष

प्रवासी मजदूरों पर हो रहे हमलों को लेकर उठाए गए सवाल न केवल श्रमिकों के अधिकारों से जुड़े हैं, बल्कि यह देश में लोकतंत्र, नागरिकता और सामाजिक न्याय जैसे मूलभूत मुद्दों पर भी पुनर्विचार की माँग करते हैं। नजीब कुरैशी का बयान सरकार की नीतियों पर कठोर आलोचना है, जो आने वाले समय में सामाजिक और राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है।

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