देहरादून/उत्तरकाशी। उत्तराखंड में इस बार लगातार हुई बारिश ने पहाड़ों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सेब कारोबार को बड़ा झटका दिया है। राज्य के कई इलाकों में हजारों टन सेब खेतों और बागानों में ही खराब हो गया। भूस्खलन से कई बाग उजड़ गए, पेड़ मलबे में दब गए और सड़कें बंद होने के कारण तैयार फसल मंडियों तक नहीं पहुंच सकी। प्रारंभिक आकलन के मुताबिक सेब उद्योग को 150 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है।
उत्तराखंड का सेब भले ही आकार में छोटा हो, लेकिन अपनी मिठास और जूस की गुणवत्ता के लिए अलग पहचान बना चुका है। उत्तरकाशी के हर्षिल, चमोली के जोशीमठ-औली, पिथौरागढ़ के मुनस्यारी, देहरादून के चकराता तथा नैनीताल के मुक्तेश्वर-रामगढ़ में पिछले एक दशक में सेब का रकबा करीब 12 हजार से बढ़कर 26 हजार हेक्टेयर तक पहुंचा। 2023-24 में राज्य में करीब 70 हजार टन सेब उत्पादन हुआ था और उत्पादन को एक लाख टन के पार ले जाने की उम्मीद जताई जा रही थी।
लेकिन जुलाई-अगस्त की बारिश ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। लगातार बारिश से पेड़ों पर लगे फलों को नुकसान पहुंचा और बड़ी मात्रा में सेब पर दाग पड़ गए। वहीं थराली, मोरी, धराली और हर्षिल घाटी में भूस्खलन के कारण कई बाग मलबे की चपेट में आ गए। कई जगह पेड़ उखड़कर नदी-नालों में बह गए।
सबसे बड़ी समस्या तब सामने आई जब सड़कें बंद होने से बची हुई फसल भी मंडियों तक नहीं पहुंच सकी। उत्तरकाशी से देहरादून के बीच कई मार्ग दिनों तक बाधित रहे। परिवहन में देरी के चलते ट्रकों और बागानों में रखा सेब खराब होता चला गया। प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार उत्तरकाशी में करीब 3,000 टन, चमोली में 2,000 टन और पिथौरागढ़ में 1,500 टन से अधिक सेब बर्बाद होने की बात सामने आई है।
सेब उत्पादकों के सामने अब फसल नुकसान के साथ कर्ज चुकाने की चुनौती भी है। चकराता के उत्पादक सुंदर सिंह रावत ने बताया कि उन्होंने करीब 10 लाख रुपये का कर्ज लेकर कोल्ड स्टोरेज और पैकेजिंग की व्यवस्था की थी, लेकिन अपेक्षित उत्पादन नहीं हो सका। मुक्तेश्वर की महिला काश्तकार राधा आर्य ने भी खरीदारों की कमी से नुकसान की बात कही।
किसानों का कहना है कि प्रति हेक्टेयर घोषित 10 हजार रुपये का मुआवजा उनकी वास्तविक लागत की तुलना में बेहद कम है। वे सेब को आपदा फसल में शामिल करने, फसल बीमा का दायरा बढ़ाने और पहाड़ी क्षेत्रों में कोल्ड स्टोरेज व रोप-वे जैसी सुविधाएं विकसित करने की मांग कर रहे हैं। किसानों को आशंका है कि समय रहते राहत नहीं मिली तो उत्तराखंड का उभरता सेब उद्योग फिर पटरी पर लौटने में लंबा समय ले सकता है।