देवीधुरा में 8 मिनट चली अनोखी बग्वाल, फल-फूलों की बारिश के बीच गूंजे जयकारे

चंपावत। उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां वाराही धाम देवीधुरा में शुक्रवार को रक्षाबंधन के अवसर पर ऐतिहासिक बग्वाल मेले का भव्य आयोजन हुआ। आस्था, लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपरा के इस अनूठे संगम को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी मेले में शामिल हुए और मां वाराही के दर्शन कर प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की।

मुख्यमंत्री के देवीधुरा पहुंचने पर हेलीपैड पर कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा, जिलाधिकारी मनीष कुमार, पुलिस अधीक्षक रेखा यादव सहित जनप्रतिनिधियों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान छोलिया नृत्य की प्रस्तुति ने माहौल को और जीवंत बना दिया।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि ऐतिहासिक बग्वाल मेला उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, आस्था और सामुदायिक सहभागिता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सरकार विकास के साथ प्रदेश की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को संरक्षित करने के लिए भी प्रतिबद्ध है। ‘मानसखंड मंदिर माला मिशन’ के तहत देवीधुरा समेत कुमाऊं के प्रमुख धार्मिक स्थलों का विकास किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि देवीधुरा मंदिर परिसर में 4.27 करोड़ रुपये से गढ़वाल खाम भवन और 4.57 करोड़ रुपये से रणकोची मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य चल रहे हैं। विभिन्न मंदिरों के सौंदर्यीकरण, सड़क, स्ट्रीट लाइट और अन्य धार्मिक अवस्थापना से जुड़े कार्य भी प्रगति पर हैं। पिछले पांच वर्षों में धार्मिक अवस्थापना एवं सौंदर्यीकरण के 397 कार्यों पर 68.58 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।

मुख्यमंत्री ने देवीधुरा को नगर पंचायत क्षेत्र बनाने की बात कही। साथ ही 9.80 करोड़ रुपये की लागत से मल्टी लेवल पार्किंग बनाने की घोषणा की। उन्होंने बताया कि बग्वाल मेले को राजकीय मेला घोषित कर व्यवस्थाओं को और मजबूत किया गया है।

मां वाराही धाम में प्रधान पुजारी की पूजा-अर्चना के बाद चार खाम—वालिक, चम्याल, गहड़वाल और लमगड़िया—के बग्वाली मैदान में पहुंचे। पारंपरिक वेशभूषा और ढालों के साथ बग्वालियों ने फल और फूलों से प्रतीकात्मक पाषाण युद्ध किया। इस वर्ष बग्वाल दोपहर 1:48 बजे शुरू होकर 1:55 बजे समाप्त हुई।

मुख्यमंत्री ने कहा कि बग्वाल के बाद सभी योद्धाओं का एक-दूसरे से गले मिलना अनुशासन और भाईचारे की मिसाल है। उन्होंने ‘विकास भी और विरासत भी’ के संकल्प को दोहराते हुए नई पीढ़ी से लोक परंपराओं के संरक्षण में भागीदारी की अपील की।

 

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