अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की एक नई रिसर्च रिपोर्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति के प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगाए गए आयात शुल्क का विदेशी निर्यातकों की कीमतों पर अपेक्षित असर नहीं पड़ा। इसके उलट, अतिरिक्त लागत का बड़ा हिस्सा अमेरिकी आयातकों को उठाना पड़ा, जिससे उन्हें सस्ते और अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता वाले उत्पादों की ओर रुख करना पड़ा।
आईएमएफ के वर्किंग पेपर में बताया गया है कि अप्रैल 2025 में लागू किए गए उच्च पारस्परिक (रिसिप्रोकल) टैरिफ का उद्देश्य विदेशी कंपनियों पर दबाव बनाकर उनके उत्पादों की कीमतें कम करवाना था। हालांकि अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश विदेशी निर्यातकों ने अपनी मूल कीमतों में कोई उल्लेखनीय कटौती नहीं की। इसका परिणाम यह हुआ कि अतिरिक्त शुल्क का आर्थिक बोझ अमेरिकी आयातकों पर आ गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ती लागत से बचने के लिए अमेरिकी आयातकों ने महंगे और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की जगह कम कीमत वाले वैकल्पिक उत्पादों और नए आपूर्तिकर्ताओं को प्राथमिकता दी। इससे अमेरिका के कुल आयात मूल्य में गिरावट जरूर दर्ज की गई, लेकिन यह गिरावट कीमतों में कमी के कारण नहीं, बल्कि आयात के स्रोत और उत्पादों में बदलाव की वजह से आई। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे उत्पादों की गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों ने अमेरिकी सीमा शुल्क के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह स्थिति वर्ष 2018-19 के अमेरिका-चीन व्यापार विवाद के दौरान देखे गए रुझानों से काफी मिलती-जुलती है। उनका कहना है कि लंबे समय तक ऊंचे टैरिफ लागू रहने से अमेरिकी कंपनियों की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है और उपभोक्ताओं को भी कम गुणवत्ता वाले सामान खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
यह अध्ययन आईएमएफ के अर्थशास्त्री जेबीन आन, लोरेंजो रोटुनो और मिशेल रूटा द्वारा तैयार किया गया है। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि आयात शुल्क बढ़ाने की नीति हमेशा विदेशी कंपनियों पर दबाव बनाने में सफल नहीं होती, बल्कि कई बार इसका सीधा असर घरेलू उद्योगों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ता है।