आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग के साथ अब इसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर भी चिंता बढ़ने लगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि एआई मॉडल को संचालित करने वाले विशाल डेटा सेंटरों को लगातार ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी और बिजली की आवश्यकता होती है। इसी मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र ने भी एआई कंपनियों से उनके पानी, बिजली और भूमि उपयोग का विस्तृत ब्योरा मांगा है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेष ने चेतावनी दी है कि यदि एआई तकनीक का विस्तार मौजूदा रफ्तार से जारी रहा तो अगले चार वर्षों में इससे जुड़ी बिजली और पानी की खपत लगभग दोगुनी हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, चैटबॉट और अन्य एआई सेवाओं के पीछे हजारों हाई-परफॉर्मेंस सर्वर लगातार काम करते हैं। इन सर्वरों से उत्पन्न गर्मी को नियंत्रित करने के लिए बड़े कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें काफी मात्रा में पानी खर्च होता है। इसके अलावा डेटा सेंटरों को बिजली उपलब्ध कराने वाले बिजलीघरों में भी शीतलन प्रक्रिया के लिए पानी की जरूरत पड़ती है। इस तरह एआई का जल उपयोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में होता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, रिवरसाइड सहित विभिन्न शोधों के मुताबिक, एआई से 10 से 50 सामान्य प्रश्न पूछने पर औसतन लगभग 500 मिलीलीटर पानी की खपत हो सकती है। यानी एक सवाल के जवाब के लिए लगभग 10 से 50 मिलीलीटर पानी खर्च होने का अनुमान है। व्यक्तिगत स्तर पर यह मात्रा कम लग सकती है, लेकिन दुनिया भर में रोजाना करोड़ों उपयोगकर्ताओं के कारण कुल जल खपत बेहद अधिक हो जाती है।
इस चुनौती से निपटने के लिए कई तकनीकी कंपनियां वैकल्पिक उपाय अपना रही हैं। गूगल समेत कई कंपनियां डेटा सेंटरों में पीने योग्य पानी की जगह पुनर्चक्रित या औद्योगिक जल का उपयोग बढ़ा रही हैं। वहीं, फिनलैंड और आयरलैंड जैसे ठंडे देशों में डेटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं ताकि प्राकृतिक ठंडी हवा से सर्वरों को ठंडा किया जा सके और पानी की खपत कम हो। भारत में फिलहाल डेटा सेंटरों की जल खपत को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कोई विशेष नीति नहीं है, हालांकि कुछ राज्य इस दिशा में नीति तैयार कर रहे हैं।