अब तक माना जाता था कि कीड़े-मकोड़े केवल जैविक प्रतिक्रियाओं के आधार पर काम करते हैं और उन्हें दर्द का अहसास नहीं होता। लेकिन हाल ही में हुई एक नई वैज्ञानिक रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। घरेलू झींगुरों यानी हाउस क्रिकेट्स पर किए गए अध्ययन में ऐसे संकेत मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि छोटे कीड़े भी दर्द महसूस कर सकते हैं और उससे राहत पाने की कोशिश करते हैं।
वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च के दौरान झींगुरों के व्यवहार का गहराई से अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि जब झींगुर के एंटीना यानी मूंछ पर हल्की गर्मी दी गई, तो उसने केवल सामान्य प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि इंसानों की तरह अपनी प्रभावित जगह को बार-बार साफ और सहलाने की कोशिश की। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह केवल रिफ्लेक्स एक्शन नहीं था, बल्कि दर्द कम करने का प्रयास था।
रिसर्च टीम के अनुसार जैसे कोई इंसान जलने के बाद अपने हाथ को रगड़ता है या ठंडे पानी में डालता है, उसी तरह झींगुर भी अपनी असहजता कम करने की कोशिश करता दिखाई दिया। यही कारण है कि इस अध्ययन को जीव विज्ञान की दुनिया में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने 40 नर और 40 मादा झींगुरों को तीन अलग-अलग समूहों में बांटा। पहले समूह के एंटीना पर 65 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला गर्म प्रोब लगाया गया, जो दर्द पैदा करने के लिए पर्याप्त था लेकिन उससे कोई स्थायी नुकसान नहीं होता था। दूसरे समूह को सामान्य प्रोब से छुआ गया, जबकि तीसरे समूह को बिना किसी स्पर्श के रखा गया।
वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिए करीब दस मिनट तक उनके व्यवहार को रिकॉर्ड किया गया। नतीजों में सामने आया कि गर्म प्रोब वाले झींगुर अपने एंटीना को बाकी झींगुरों की तुलना में दोगुनी बार साफ कर रहे थे और उस पर चार गुना ज्यादा समय बिता रहे थे। खास बात यह थी कि वे केवल उसी हिस्से को साफ कर रहे थे जहां गर्मी दी गई थी।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रिसर्च इस बात की ओर इशारा करती है कि बिना रीढ़ वाले जीवों में भी दर्द महसूस करने की क्षमता हो सकती है। इससे जानवरों और कीड़ों को लेकर इंसानों की सोच में बड़ा बदलाव आ सकता है।