क्या अब आरक्षण व्यवस्था में होगा बड़ा बदलाव? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस

सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण व्यवस्था को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमी लेयर से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता आईएएस अधिकारी हैं और आर्थिक-सामाजिक रूप से सक्षम हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए। अदालत की इस टिप्पणी के बाद आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग फिर चर्चा में आ गई है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुईयां की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि आरक्षण का उद्देश्य कमजोर और वंचित वर्गों को आगे लाना है। यदि किसी परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बेहतर हो चुकी है, तो लगातार उसी परिवार को आरक्षण का लाभ मिलना व्यवस्था के मूल उद्देश्य पर सवाल खड़ा करता है।

भारत के संविधान में आरक्षण व्यवस्था सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को समान अवसर देने के लिए लागू की गई थी। साथ ही समय-समय पर इसकी समीक्षा का प्रावधान भी रखा गया था। लेकिन राजनीतिक कारणों और वोट बैंक की राजनीति के चलते आरक्षण व्यवस्था पर व्यापक समीक्षा नहीं हो पाई। विशेषज्ञों का मानना है कि आज भी कई जरूरतमंद लोग आरक्षण के लाभ से वंचित हैं, जबकि कुछ परिवार पीढ़ियों से इसका फायदा उठा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने की बात कह चुका है, लेकिन अब तक केंद्र या राज्यों ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए हैं। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के भीतर भी अलग-अलग राय देखने को मिलती है। कुछ लोग जाति आधारित आरक्षण की बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत करते हैं, जबकि अन्य इसे सामाजिक न्याय से जोड़कर देखते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि करीब आठ दशक बाद भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक समान अवसर नहीं पहुंच पाए हैं। ऐसे में आरक्षण नीति की समीक्षा कर यह सुनिश्चित करना जरूरी हो गया है कि इसका लाभ वास्तव में जरूरतमंद और वंचित तबकों तक पहुंचे।

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