खूंटी। दीपावली हो या कोई मांगलिक अवसर, मिट्टी के दीयों की रोशनी भारतीय परंपरा और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है। मिट्टी के साधारण ढेले को सुंदर दीये, घड़े, सुराही और खिलौनों का आकार देने वाले कुम्हार सदियों से इस विरासत को सहेजते आए हैं। लेकिन बदलती जीवनशैली, आधुनिक बाजार और आर्थिक तंगी ने अब इस पारंपरिक कारोबार के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। हालात ऐसे हैं कि दूसरों के घरों में रोशनी फैलाने वाले कारीगरों के अपने घर आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं।
झारखंड के खूंटी जिले में भी मिट्टी के कारीगरों की स्थिति चिंताजनक है। तोरपा कुम्हार टोली निवासी रामाशीष महतो और कृष्णा महतो बताते हैं कि समय के साथ कुम्हारों के चाक की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है। पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करने वाले परिवार अब इस पेशे के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि मेहनत और समय के अनुपात में आमदनी नहीं होने के कारण नई पीढ़ी भी इस कारोबार से दूरी बनाने लगी है।
बाजार में बदली पसंद, घटती जा रही मांग
पहले दीपावली पर घर-घर मिट्टी के दीये जलाए जाते थे। पूजा-पाठ और रोजमर्रा के इस्तेमाल में भी मिट्टी के बर्तनों की विशेष जगह थी। अब प्लास्टिक, स्टील, चीनी मिट्टी और बिजली से चलने वाले सजावटी उत्पादों ने इनकी जगह लेनी शुरू कर दी है। रंग-बिरंगी झालरों और आकर्षक कृत्रिम सजावटी सामान की उपलब्धता ने मिट्टी के उत्पादों की मांग को प्रभावित किया है।
कारीगरों के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उत्पादन में लगने वाली मेहनत और लागत के बावजूद बाजार में उचित कीमत नहीं मिलती। ऐसे में परिवार का खर्च चलाना भी मुश्किल हो जाता है।
कच्चा माल जुटाना भी बना चुनौती
खूंटी के पिपराटोली निवासी बुद्धू महतो बताते हैं कि कुम्हारों की मुश्किलें केवल बिक्री तक सीमित नहीं हैं। अच्छी मिट्टी की उपलब्धता लगातार चुनौती बन रही है। पहले आसपास के क्षेत्रों से आसानी से मिट्टी मिल जाती थी, लेकिन अब इसके लिए अतिरिक्त परिवहन खर्च उठाना पड़ता है। वहीं, मिट्टी के उत्पाद पकाने के लिए ईंधन की बढ़ती कीमत और भट्ठियों की व्यवस्था भी आर्थिक बोझ बढ़ा रही है।
कारीगरों का कहना है कि यदि पारंपरिक कला को बचाना है तो उनके उत्पादों को बाजार, उचित मूल्य और सरकारी प्रोत्साहन उपलब्ध कराना जरूरी है। अन्यथा सदियों पुरानी यह कला धीरे-धीरे केवल यादों तक सिमट सकती है।
