नई दिल्ली। मानव शरीर के भीतर खरबों सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं, जिनमें बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्मजीव शामिल हैं। खासतौर पर आंतों में रहने वाले इन सूक्ष्मजीवों के जटिल समुदाय को गट माइक्रोबायोम कहा जाता है। वैज्ञानिक शोधों से यह समझ विकसित हुई है कि शरीर के सभी सूक्ष्मजीव हानिकारक नहीं होते। इनमें से कई पाचन, प्रतिरक्षा और शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
गट माइक्रोबायोम भोजन को पचाने में मदद करने के साथ कुछ विटामिनों के निर्माण और प्रतिरक्षा तंत्र के सामान्य कामकाज में योगदान देता है। इसका प्रभाव केवल पेट तक सीमित नहीं माना जाता। आंत और मस्तिष्क के बीच लगातार संकेतों का आदान-प्रदान होता है, जिसे गट-ब्रेन कनेक्शन कहा जाता है। यही कारण है कि तनाव या चिंता की स्थिति में कुछ लोगों को गैस, पेट फूलना, कब्ज या अन्य पाचन संबंधी परेशानियां महसूस हो सकती हैं। इसी तरह आंत से जुड़ी कुछ समस्याओं का असर मूड और सामान्य मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गट माइक्रोबायोम को स्वस्थ रखने में खान-पान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दाल, चना, राजमा, फल, सब्जियां, ओट्स, बाजरा और ज्वार जैसे फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ आंतों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। फाइबर का कुछ हिस्सा बड़ी आंत तक पहुंचता है, जहां मौजूद बैक्टीरिया उसे तोड़कर ऐसे पदार्थ बनाते हैं, जो शरीर की विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं।
इसके विपरीत अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन, मीठे पेय, कम शारीरिक गतिविधि और जरूरत से अधिक एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल गट माइक्रोबायोम की संरचना को प्रभावित कर सकता है। शोधों में अलग-अलग आबादी और जीवनशैली के आधार पर गट माइक्रोबायोम में अंतर भी सामने आया है।
हालांकि, किसी एक खाद्य पदार्थ या आदत को गट माइक्रोबायोम में बदलाव का अकेला कारण नहीं माना जा सकता। मोटापा, मधुमेह और अन्य मेटाबॉलिक बीमारियों के साथ इसके संभावित संबंधों पर भी शोध जारी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अधिकांश लोगों के लिए गट स्वास्थ्य बेहतर करने की शुरुआत महंगे प्रोबायोटिक सप्लीमेंट के बजाय संतुलित, विविध और फाइबर युक्त आहार से की जा सकती है।