रामगढ़ । कभी गांवों की जरूरत, छोटे कारोबार और सामाजिक संवाद के प्रमुख केंद्र रहे पचरुखिया ढाला और रामपुर बाजार आज अपनी पहचान खोने की कगार पर हैं। एक समय इन बाजारों में आसपास के गांवों से लोगों की आवाजाही रहती थी, लेकिन अब धीरे-धीरे व्यापारिक गतिविधियां सिमटती जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर गांवों के पुराने बाजार क्यों खत्म हो रहे हैं?
NH-31 पर विकसित होने वाले शुरुआती छोटे बाजारों में शामिल पचरुखिया ढाला कभी आसपास के गांवों के लिए महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। यहां स्थानीय लोगों के साथ क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक चर्चाएं भी होती रही हैं। देश और प्रदेश की राजनीति से लेकर क्षेत्र की समस्याओं तक पर यहां बातचीत होती थी। लेकिन समय के साथ बाजार की रौनक कम होती गई और अब इसका अस्तित्व चुनौती में नजर आ रहा है।
इसी तरह दीघार ग्रामसभा का रामपुर बाजार भी धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। कभी अपनी अलग पहचान रखने वाला यह बाजार आज पहले जैसी चहल-पहल से दूर है। इसके विपरीत रामगढ़ बाजार लगातार विस्तार कर रहा है और व्यापारिक गतिविधियों के चलते अपनी पहचान मजबूत बना रहा है।
बाजार के विकास में केवल सड़क और आबादी ही नहीं, बल्कि स्थानीय व्यापारियों की सक्रियता, पर्याप्त दुकानें, व्यापारिक नेटवर्क और बाजार को व्यवस्थित तरीके से विकसित करने की सोच भी अहम भूमिका निभाती है।
पचरुखिया ढाला को लेकर सबसे बड़ा सवाल छोटे व्यापारियों के लिए पर्याप्त जगह का है। जब स्थानीय लोगों को सामान बेचने के लिए व्यवस्थित स्थान ही उपलब्ध नहीं होगा, तो बाजार का विस्तार कैसे होगा? आखिर बाजार सिर्फ दुकानें नहीं, बल्कि रोजगार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक जुड़ाव का केंद्र भी होते हैं।
अब जरूरत है कि जनप्रतिनिधि राजनीतिक चर्चाओं के साथ पचरुखिया और रामपुर बाजार के पुनर्जीवन पर भी गंभीरता से विचार करें। पुराने बाजारों को सुविधाएं, व्यापारिक स्थान और बेहतर व्यवस्था मिले तो स्थानीय कारोबार और रोजगार को नई गति मिल सकती है।
बाजार बचेंगे तो छोटे व्यापारी बचेंगे, छोटे व्यापारी बचेंगे तो गांव की अर्थव्यवस्था बचेगी और गांवों की आर्थिक ताकत बचेगी तो क्षेत्र की पहचान भी कायम रहेगी।