पश्चिम मेदिनीपुर जिले के पिंगला के नयाग्राम की पारंपरिक पाटचित्र कला अब नए रूप में अपनी पहचान बना रही है। कभी घर-घर जाकर रामायण, महाभारत, मनसामंगल और कृष्णलीला जैसी कथाएं सुनाने वाले पटुआ कलाकार अब अपनी कला को साड़ी, टी-शर्ट, जूते, बैग, गहने, कुशन और घरेलू सामान तक पहुंचा रहे हैं। पूजा पंडालों में भी पाटचित्र की मांग लगातार बढ़ रही है।
पाटचित्र की परंपरा में कपड़े या कागज पर चित्र बनाकर उसे गीत और कथावाचन के साथ प्रस्तुत किया जाता था। कलाकार लंबे पट को लाठी पर लपेटकर घर-घर जाते और चित्रों के माध्यम से धार्मिक एवं लोक कथाएं सुनाते थे। बदले में उन्हें अनाज, सब्जियां और कभी-कभी नकद राशि मिलती थी।
समय के साथ यह परंपरागत पेशा कमजोर पड़ने लगा। कम आमदनी के कारण कई कलाकारों ने पाटचित्र बनाना छोड़ दिया। करीब 70 वर्षीय कलाकार शमशाद चित्रकर बताते हैं कि एक समय एक पाटचित्र के लिए 25 रुपये से अधिक नहीं मिलते थे। कोलकाता जाकर पूरा दिन काम करने के बावजूद आमदनी बेहद कम रहती थी।
हाल के वर्षों में कलाकारों ने पाटचित्र को आधुनिक जरूरतों से जोड़कर नई राह तलाश ली है। अब हाथ के पंखे और चाय के बर्तनों से लेकर किमोनो, जैकेट, स्कार्फ, लैपटॉप कवर, बैग, अंगूठी और गले के आभूषण तक पर यह कला दिखाई दे रही है। विदेशी पर्यटकों की रुचि बढ़ने के साथ पाटचित्र कलाकारों को रूस, अमेरिका, स्कॉटलैंड, ऑस्ट्रेलिया और जापान तक अपनी कला पहुंचाने का अवसर मिला है।
विद्यासागर विश्वविद्यालय के नृविज्ञान विभाग ने भी कलाकारों को आधुनिक उत्पादों पर पाटचित्र बनाने का प्रशिक्षण दिया है। प्रसन्न चित्रकर और संजीव चित्रकर के मुताबिक इस पहल से कलाकारों के लिए नए बाजार खुले हैं और विदेशों में भी उनकी कला पसंद की जा रही है।
कलाकार रशीद चित्रकर ने बताया कि पहले पूजा पंडालों के कुछ हिस्सों में पाटचित्र बनाया जाता था, जबकि अब पूरे पंडाल की जिम्मेदारी मिल रही है। कलाकार धार्मिक कथाओं के साथ सामाजिक संदेशों को भी पाटचित्र के जरिए लोगों तक पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं।
इस तरह पिंगला की पाटचित्र कला अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि रोजगार और आधुनिक बाजार से जुड़ती नई पहचान बन रही है।