चीरबासा में पांच घंटे बाद खुला रास्ता, सुरक्षा इंतजामों पर उठे सवाल
हर साल मलबा हटाने पर करोड़ों खर्च, लेकिन स्थायी समाधान अब भी अधूरा
357 करोड़ की डेंजर जोन परियोजना कब उतरेगी जमीन पर?
तकनीक, वैज्ञानिक योजना और संयम से ही सुरक्षित होगी बाबा केदार की डगर
वंशिका बिष्ट, देहरादून
उत्तराखंड में मानसून एक बार फिर केदारनाथ यात्रा पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। शुक्रवार सुबह करीब साढ़े छह बजे केदारनाथ पैदल मार्ग पर चीरबासा हेलीपैड के समीप अचानक पहाड़ी से विशाल बोल्डर और भारी मलबा गिरने लगा। यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन ने तत्काल यात्रा रोक दी। आपदा प्रबंधन और लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) की टीमों ने मौके पर पहुंचकर राहत कार्य शुरू किया और करीब पांच घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद दोपहर एक बजे मार्ग को साफ कर यात्रा दोबारा शुरू कराई। हालांकि गौरीकुंड क्षेत्र में लगातार पत्थर गिरने की घटनाएं और मौसम विभाग का ऑरेंज अलर्ट अब भी यात्रियों की चिंता बढ़ा रहा है।
दरअसल, यह कोई नई स्थिति नहीं है। मानसून के दौरान केदारघाटी में भूस्खलन और पहाड़ियों का दरकना लगभग हर वर्ष की चुनौती बन चुका है। सड़क और पैदल मार्ग से मलबा हटाने तथा यातायात बहाल करने पर हर साल सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन शुक्रवार की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या केवल मलबा हटाना ही पर्याप्त समाधान है? विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय विश्व की सबसे युवा और अत्यंत संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। ऐसे में केवल अस्थायी मरम्मत के बजाय उन कमजोर ढलानों का वैज्ञानिक उपचार जरूरी है, जहां से बार-बार चट्टानें और बोल्डर गिरते हैं।
इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने रुद्रप्रयाग से गौरीकुंड तक राष्ट्रीय राजमार्ग-107 पर चिन्हित 17 अतिसंवेदनशील डेंजर जोन के स्थायी उपचार हेतु 357 करोड़ रुपये की परियोजना स्वीकृत की है। इसके तहत पारंपरिक सुरक्षा उपायों के बजाय आधुनिक जियो-टेक्निकल इंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। इनमें ढलानों को मजबूत बनाने के लिए रॉक बोल्टिंग, चट्टानों को स्थिर करने के लिए शॉटक्रीट, पत्थरों को रोकने हेतु स्टील ड्रैप नेटिंग तथा मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए बायो-इंजीनियरिंग तकनीकों के माध्यम से विशेष पौधारोपण जैसी योजनाएं शामिल हैं।
नीतिगत दृष्टि से देखें तो जब तक इन 17 संवेदनशील स्थलों का स्थायी उपचार पूरा नहीं हो जाता, तब तक केदारनाथ यात्रा हर मानसून में जोखिम के साये में रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इंजीनियरिंग उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। यात्रा मार्ग की कैरीइंग कैपेसिटी के अनुरूप श्रद्धालुओं की संख्या का वैज्ञानिक प्रबंधन, आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम को और अधिक प्रभावी बनाना तथा मौसम आधारित रियल-टाइम निगरानी व्यवस्था विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है।
शुक्रवार की घटना एक बार फिर यह याद दिलाती है कि हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन केवल राहत कार्यों तक सीमित नहीं रह सकता। स्थायी समाधान के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आधुनिक तकनीक और दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है। जब तक यह व्यवस्था पूरी तरह जमीन पर नहीं उतरती, तब तक केदारनाथ यात्रा की सुरक्षा काफी हद तक प्रशासन की सतर्कता, आपदा प्रबंधन टीमों की मुस्तैदी और श्रद्धालुओं के संयम पर ही निर्भर रहेगी।