- बीकेटीसी के कर्मचारी प्रमोद नौटियाल एसआईटी की हिरासत में
- केदारनाथ-बदरीनाथ मंदिर विवाद में बड़ा अपडेट, कैसे बचेगा भक्तों का भरोसा?
- तीन अफसरों पर गाज गिरने के बाद अब डिजिटल और पारदर्शी ऑडिट की तैयारी
ममता सिंह, देहरादून/ नई दिल्ली।
उत्तराखंड के सबसे पवित्र और करोड़ों हिंदुओं की अगाध आस्था के केंद्र केदारनाथ और बदरीनाथ मंदिर इन दिनों किसी धार्मिक उत्सव के कारण नहीं, बल्कि प्रशासनिक-वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के बड़े खुलासों के कारण चर्चा में हैं। देवभूमि की धार्मिक व्यवस्था संभालने वाली केदारनाथ-बदरीनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के भीतर फैले इस कथित सिंडिकेट पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है।
शासन ने प्राथमिक जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) विजय प्रसाद थपलियाल, अनिल ध्यानी और अरविंद शुक्ला को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इन अधिकारियों पर टेंडर प्रक्रिया में मनमानी, अधिकारों के दुरुपयोग और गंभीर प्रशासनिक लापरवाही के आरोप हैं। इसके साथ ही बदरीनाथ मंदिर के कर्मचारी प्रदीप नौटियाल पर लाखों रुपये के सीधे गबन का आरोप है, जबकि मंदिर समिति के कर्मचारी प्रमोद नौटियाल को एसआईटी ने देहरादून से हिरासत में लेकर चमोली और बदरीनाथ में जांच तेज कर दी है। इस पूरे मामले को अब विजिलेंस और विशेष ऑडिट विंग को सौंप दिया गया है, जो इसकी तह तक जाने में जुटी हैं।
आस्था के आंगन में सुनियोजित सेंधमारी
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ कुछ लाख रुपयों की हेरफेर का नहीं, बल्कि मंदिर समिति के भीतर की आंतरिक निगरानी प्रणाली (इंटरनल मॉनिटरिंग सिस्टम) के पूरी तरह ध्वस्त होने का जीवंत प्रमाण है। हर साल चारधाम यात्रा के दौरान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा करोड़ों रुपये का चढ़ावा, ऑनलाइन दान और सरकारी फंड समिति के पास आता है। लेकिन एक पुख्ता ऑडिट मैकेनिज्म न होने की वजह से ऐसे लूपहोल्स (कमियां) बने रहे, जिनका फायदा उठाकर अधिकारियों ने कथित तौर पर व्यवस्था का वारा-न्यारा किया। सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि रसीद काटने और कैश मैनेजमेंट में जानबूझकर मैन्युअल यानी कागजी व्यवस्था को बनाए रखा गया था। आज के डिजिटल युग में भी इस जिद के पीछे का मकसद साफ था—ताकि हेरफेर आसानी से की जा सके और पकड़े जाने का कोई डिजिटल ट्रेल या सुराग न छूटे।
खोखली व्यवस्था के लिए एक बड़ा सबक
यह निलंबन और धरपकड़ सिर्फ एक तात्कालिक दंडात्मक कार्रवाई नहीं है, बल्कि इस बात का साफ संकेत है कि अब व्यवस्था के भीतर एक बड़े और कड़े ऑपरेशन की जरूरत है। आस्था के इन बड़े केंद्रों पर इस तरह की धांधली सामने आने से न सिर्फ सरकार की जीरो टॉलरेंस की नीति को चुनौती मिली है, बल्कि दूर-दराज से अपनी गाढ़ी कमाई लेकर आने वाले भक्तों की भावनाएं भी बुरी तरह आहत हुई हैं। मंदिर समिति के वर्तमान नेतृत्व के कंधों पर इस समय केवल तात्कालिक संकट से निपटने की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि व्यवस्था को पूरी तरह से री-बूट करने की सबसे बड़ी चुनौती है। उन्हें तात्कालिक छापों से आगे बढ़कर ऐसे दूरगामी और ऐतिहासिक बदलाव करने होंगे जिससे भविष्य में कोई भी ऐसा दुस्साहस न कर सके।
पारदर्शी और डिजिटल भविष्य की रूपरेखा
भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए मंदिर प्रशासन को तत्काल ‘शत-प्रतिशत डिजिटलाइजेशन’ की नीति अपनानी होगी। केदारनाथ और बदरीनाथ में मिलने वाले दान, चढ़ावे, वीआईपी दर्शन की रसीदों और दैनिक खर्चों से जुड़े हर एक पैसे का हिसाब लाइव ऑनलाइन पोर्टल पर पारदर्शी होना चाहिए, ताकि किसी भी स्तर पर मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश ही न बचे। इसके अलावा, समिति के पिछले पांच सालों के खातों का फोरेंसिक ऑडिट किसी स्वतंत्र और प्रतिष्ठित केंद्रीय एजेंसी या कैग (सीएजी) से कराया जाना