भारतीय लोक कला और संस्कृति की अमूल्य धरोहर, प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रही थीं और पिछले कई सप्ताह से एम्स में भर्ती थीं। रविवार सुबह करीब 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की पुष्टि एम्स के जनसंपर्क अधिकारी ने की, जिसके बाद देशभर के कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर फैल गई।
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में वर्ष 1956 में जन्मीं तीजन बाई ने पंडवानी, यानी महाभारत की पारंपरिक कथा गायन शैली, को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। उन्होंने उस समय पंडवानी की कापालिक शैली को अपनाया, जब इस शैली में पुरुष कलाकारों का वर्चस्व माना जाता था। शुरुआती दौर में उन्हें सामाजिक विरोध और कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन अपनी प्रतिभा, दमदार आवाज और प्रभावशाली मंच प्रस्तुति के दम पर उन्होंने सभी बाधाओं को पार कर लिया।
पांच दशक से अधिक लंबे अपने कलात्मक सफर में तीजन बाई ने भारत ही नहीं, बल्कि एशिया और यूरोप सहित दुनिया के कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का परचम लहराया। उनकी प्रस्तुतियों ने भारतीय लोक कला को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और नई पीढ़ी के कलाकारों को भी प्रेरित किया।
लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और वर्ष 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की पंडवानी कला को पूरी दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई। प्रधानमंत्री ने इसे कला एवं संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए उनके परिजनों और प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त की।