देहरादून: उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और कला संरक्षण को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। देहरादून स्थित उत्तरा समकालीन कला दीर्घा की वर्तमान स्थिति कला प्रेमियों और कलाकारों के बीच चिंता का विषय बनी हुई है। वरिष्ठ कला समीक्षक तारा चंद शर्मा ने कला दीर्घा का अवलोकन करने के बाद इसके संरक्षण और रखरखाव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
उन्होंने बताया कि इस कला दीर्घा की स्थापना प्रख्यात कलाकार स्वर्गीय सुरेन्द्र पाल जोशी के प्रयासों से हुई थी। उनकी दूरदृष्टि और समर्पण के परिणामस्वरूप देहरादून को एक महत्वपूर्ण समकालीन कला केंद्र मिला, जो वर्तमान में संस्कृति मंत्रालय के अधीन संचालित है। लेकिन समय के साथ इस संस्थान की देखरेख में कमी दिखाई देने लगी है।
निरीक्षण के दौरान कई महत्वपूर्ण कलाकृतियों पर फंगस और जंग के निशान देखे गए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन कलाकृतियों का समय रहते वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण नहीं किया गया, तो यह अमूल्य धरोहर स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है। यह केवल कुछ चित्रों या मूर्तियों का मामला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखी गई धरोहर का प्रश्न है।
कला जगत से जुड़े लोगों का यह भी कहना है कि कला दीर्घा स्थानीय स्तर पर अपेक्षित प्राथमिकता नहीं पा रही है। इसके अलावा मुख्य मार्ग पर लगाए गए बैरिकेड्स के कारण आम नागरिकों और कला प्रेमियों की पहुंच भी प्रभावित हो रही है, जिससे यहां आने वाले दर्शकों की संख्या में कमी देखी जा रही है।
कला प्रेमियों ने संस्कृति मंत्रालय, उत्तराखंड सरकार और स्थानीय प्रशासन से अपील की है कि कला दीर्घा के संरक्षण, नियमित रखरखाव और बेहतर संचालन के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। उनका कहना है कि यह संस्थान केवल एक भवन नहीं, बल्कि देहरादून की सांस्कृतिक पहचान और उत्तराखंड की समृद्ध कला परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो राज्य की यह बहुमूल्य कला विरासत अपूरणीय क्षति का सामना कर सकती है। ऐसे में इस धरोहर को सुरक्षित रखना सभी संबंधित संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी बन जाती है।