नई दिल्ली। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित करने के फैसले ने पाकिस्तान में संभावित जल संकट को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी थीं। पाकिस्तान के सरकारी दस्तावेजों और जल प्रबंधन एजेंसियों के आकलन के अनुसार, वर्ष 2025 के खरीफ सीजन की शुरुआत तक देश को लगभग 21 प्रतिशत पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता था।
पाकिस्तानी अधिकारियों को विशेष रूप से झेलम और चिनाब नदियों में कम जल प्रवाह की आशंका सता रही थी। ये दोनों नदियां पंजाब और सिंध जैसे कृषि प्रधान प्रांतों की सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। जल संकट की आशंका को देखते हुए अधिकारियों ने जलाशयों के उपयोग में अत्यधिक सावधानी बरतने और सीमित जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए रणनीतियां तैयार करनी शुरू कर दी थीं।
रिपोर्टों के अनुसार, खरीफ सीजन शुरू होने से पहले पाकिस्तान के दो प्रमुख जलाशय टरबेला और मंगला लगभग डेड स्टोरेज स्तर तक पहुंच गए थे। पिछले सीजन का बचा हुआ पानी भी बेहद कम था, जिसके कारण पूरे सीजन के लिए जल वितरण योजना को टाल दिया गया था। कई बैठकों में अधिकारियों ने इस बात पर चिंता जताई थी कि चिनाब नदी में भारत की ओर से जल प्रवाह कम होने से हालात और गंभीर हो सकते हैं।
हालांकि, जिस बड़े जल संकट की आशंका के मद्देनजर पाकिस्तान तैयारी कर रहा था, वह स्थिति अंततः नहीं बनी। कुछ ही महीनों बाद ऊपरी क्षेत्रों में तेजी से बर्फ पिघलने लगी और अगस्त 2025 में आई भीषण बाढ़ ने पाकिस्तान की जल स्थिति को पूरी तरह बदल दिया। अचानक जलाशयों में पानी का स्तर बढ़ गया और वे लगभग अपनी पूरी क्षमता तक भर गए।
इस अप्रत्याशित प्राकृतिक राहत ने तत्काल जल संकट को टाल दिया, लेकिन विशेषज्ञ इसे स्थायी समाधान नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और सीमापार जल प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियां भविष्य में पाकिस्तान के लिए और भी गंभीर जल संकट का कारण बन सकती हैं। ऐसे में दीर्घकालिक जल संरक्षण और प्रभावी प्रबंधन रणनीति अपनाना पाकिस्तान के लिए बड़ी आवश्यकता बन गया है।