नई दिल्ली। भारत समेत दक्षिण एशिया के कई देशों के लिए आने वाले महीने मौसम के लिहाज से चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने अल नीनो की तेजी से मजबूत होती स्थिति को लेकर चेतावनी दी है और इसकी तुलना वर्ष 1997 के चर्चित ‘गॉडजिला अल नीनो’ से की जा रही है, जिसे अब तक का सबसे शक्तिशाली अल नीनो माना जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर में बन रही मौजूदा परिस्थितियां पिछले कई दशकों के सबसे प्रभावशाली अल नीनो की ओर इशारा कर रही हैं। नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (जेपीएल) द्वारा जारी उपग्रह आंकड़ों में समुद्र के भीतर बड़ी मात्रा में गर्मी जमा होने के संकेत मिले हैं। इन आंकड़ों ने मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है।
सेंटिनल-6 माइकल फ्रीलिच उपग्रह से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के विस्तृत हिस्सों में समुद्र का जलस्तर सामान्य से अधिक दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र के पानी के गर्म होने पर उसका आयतन बढ़ता है, जिससे जलस्तर में वृद्धि होती है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि समुद्र की सतह के नीचे बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है, जो वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित कर सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र के भीतर बनने वाली विशाल जल-तरंगें, जिन्हें केल्विन वेव्स कहा जाता है, इस गर्मी को प्रशांत महासागर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का काम कर रही हैं। व्यापारिक हवाओं के कमजोर होने पर इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के समीप जमा गर्म पानी पूर्वी प्रशांत की ओर बढ़ता है। इससे समुद्र की गहराइयों से ऊपर आने वाला ठंडा पानी कम हो जाता है और सतह का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है, जो अल नीनो की प्रमुख पहचान मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रक्रिया जारी रही तो आने वाले महीनों में अल नीनो और अधिक शक्तिशाली हो सकता है। इतिहास बताता है कि अल नीनो के प्रभाव से दुनिया के कई क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है, जबकि भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। मौसम एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।