स्मार्ट सिटी या प्यासे महानगर? मुंबई-बेंगलुरु के जल संकट ने खड़े किए बड़े सवाल

देश के दो सबसे विकसित और आर्थिक रूप से समृद्ध महानगर मुंबई और बेंगलुरु इन दिनों गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। कभी आधुनिक शहरी विकास और स्मार्ट सिटी मॉडल के प्रतीक माने जाने वाले ये शहर अब पीने के पानी की कमी से जूझ रहे हैं, जिससे विकास की वर्तमान अवधारणा पर सवाल उठने लगे हैं।

मुंबई में शहर को पानी उपलब्ध कराने वाले प्रमुख जलाशयों का जलस्तर तेजी से घटने के बाद प्रशासन ने पानी की कटौती लागू करने की घोषणा की है। वहीं, बेंगलुरु में स्थिति पहले से ही चिंताजनक बनी हुई है। झीलों के शहर के रूप में पहचान रखने वाला बेंगलुरु आज हजारों पानी के टैंकरों पर निर्भर हो गया है। कई इलाकों में भूजल स्तर सैकड़ों फीट नीचे पहुंच चुका है, जिससे लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

विशेषज्ञ इस संकट के लिए अल नीनो प्रभाव, कम बारिश और जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि असली समस्या अनियोजित शहरीकरण और प्राकृतिक जल स्रोतों की अनदेखी है। पिछले कुछ दशकों में विकास के नाम पर तालाबों, झीलों और वेटलैंड क्षेत्रों को पाटकर बड़े आवासीय परिसर, व्यावसायिक भवन और आईटी पार्क खड़े कर दिए गए। इससे वर्षा जल का प्राकृतिक संचयन प्रभावित हुआ और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया कमजोर पड़ गई।

इस बीच डेटा सेंटर उद्योग की बढ़ती जल खपत भी बहस का विषय बन गई है। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ देशभर में तेजी से डेटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं, जिन्हें सर्वरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी और बिजली की आवश्यकता होती है। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि सीमित जल संसाधनों के उपयोग में प्राथमिकता आम नागरिकों को मिलनी चाहिए या बड़े डिजिटल और औद्योगिक ढांचों को।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्षा जल संचयन, वेटलैंड संरक्षण, झीलों के पुनर्जीवन और भूजल पुनर्भरण जैसे उपायों पर गंभीरता से अमल नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में देश के अन्य महानगर भी इसी संकट का सामना कर सकते हैं। मुंबई और बेंगलुरु की मौजूदा स्थिति देश के लिए एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।

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