27 दिन बाद भी नहीं मिला बबीता का सुराग, अब जंगलों और टैंकों में क्यों हो रही खुदाई?

उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रैक से लापता हुई 24 वर्षीय एमबीए छात्रा बबीता पांडे की गुमशुदगी अब एक रहस्यमयी पहेली बनती जा रही है। 29 मई की रात गोई बेस कैंप से अचानक गायब हुई रामनगर निवासी बबीता का लगभग एक महीना बीतने के बावजूद कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया है। सेना, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, एसडीआरएफ, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) और स्थानीय पुलिस की संयुक्त तलाश के बावजूद मामला अब तक अनसुलझा बना हुआ है।

प्रारंभिक चरण में सैकड़ों जवानों की मदद से बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन चलाया गया। ड्रोन कैमरों, स्निफर डॉग्स और हेलीकॉप्टर की सहायता से दुर्गम इलाकों की गहन तलाशी ली गई, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। इसके बाद पुलिस ने जांच की दिशा बदलते हुए नए सिरे से खोज अभियान शुरू किया है।

सीओ जनक सिंह पंवार और सीओ चंचल शर्मा के नेतृत्व में टीमें अब दयारा ट्रैक के बाईं ओर स्थित नटीण क्षेत्र के घने जंगलों में सर्च ऑपरेशन चला रही हैं। यह इलाका भालुओं के संभावित आवासीय क्षेत्रों में माना जाता है। जांच दल जंगलों के भीतर बने पानी के टैंकों की गहराई की जांच कर रहे हैं, जबकि संदिग्ध स्थानों और खुदाई वाले हिस्सों को दोबारा खंगालने के लिए पानी डालकर निरीक्षण किया जा रहा है।

जांच के दौरान एक अहम तथ्य भी सामने आया है। पुलिस के मुताबिक, बबीता और उसके साथ गए दो युवकों ने ट्रैकिंग के लिए अनिवार्य ऑनलाइन पंजीकरण नहीं कराया था। इसके बजाय कथित तौर पर एक पुराने और समाप्त हो चुके फिजिकल परमिट पर नाम बदलकर इस्तेमाल किया गया। इस खुलासे के बाद दोनों युवकों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है और अपहरण के संभावित एंगल से भी जांच आगे बढ़ाई जा रही है।

स्थानीय स्तर पर जंगली जानवरों के हमले, दुर्घटना और अन्य संभावनाओं को लेकर चर्चाएं जारी हैं। यह मामला उत्तराखंड के ट्रैकिंग रूटों पर सुरक्षा प्रबंधन, पर्यटकों के सत्यापन और अवैध गाइडिंग व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है। फिलहाल बबीता की तलाश जारी है और परिवार को अब भी किसी चमत्कार की उम्मीद है।

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