नई दिल्ली। चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में भारत के प्राचीन ज्ञान को एक बार फिर वैश्विक सम्मान मिला है। करीब 2600 वर्ष पूर्व शल्य चिकित्सा की नींव रखने वाले महर्षि सुश्रुत को स्कॉटलैंड के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में विशेष सम्मान दिया गया है। कॉलेज के प्लेफेयर ऑडिटोरियम में उनकी 90 किलोग्राम वजनी कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है, जिससे दुनिया के सामने भारतीय चिकित्सा परंपरा की समृद्ध विरासत को नई पहचान मिली है।
महर्षि सुश्रुत को आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी का जनक और विश्व का प्रथम सर्जन माना जाता है। इतिहासकारों और चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, उन्होंने लगभग 2600 वर्ष पहले 300 से अधिक जटिल शल्य क्रियाएं सफलतापूर्वक संपन्न की थीं। इतना ही नहीं, उन्होंने इन ऑपरेशनों के लिए 124 प्रकार के सर्जिकल उपकरणों का भी विकास किया था, जिनका उल्लेख उनके प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ में मिलता है।
सुश्रुत संहिता को शल्य चिकित्सा पर दुनिया का सबसे प्राचीन और विस्तृत ग्रंथ माना जाता है। इसमें 184 अध्यायों के माध्यम से 1120 रोगों, 700 औषधीय पौधों, 64 खनिजों और 57 पशु-आधारित औषधीय पदार्थों का उल्लेख किया गया है। यह ग्रंथ केवल सर्जरी तक सीमित नहीं है, बल्कि बाल रोग, स्त्री रोग, विष विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य और शरीर रचना विज्ञान जैसे विषयों पर भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।
महर्षि सुश्रुत ने आयुर्वेद की शिक्षा गुरु दिवोदास धन्वंतरि से प्राप्त की थी और अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनका मानना था कि एक सच्चा वैद्य वही है, जो रोगी के दुख को अपना दुख समझे। आज भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान उनके सिद्धांतों और तकनीकों से प्रेरणा ले रहा है। भारत में प्रत्येक वर्ष 15 जुलाई को ‘सुश्रुत दिवस’ मनाया जाता है।
ब्रिटेन में स्थापित यह प्रतिमा यूके में कार्यरत तेलुगु मूल के सर्जन प्रोफेसर चंद्रा चेरुवू और चेरुवू फैमिली फाउंडेशन की पहल पर दान की गई है। इस सम्मान के साथ विश्व समुदाय ने एक बार फिर स्वीकार किया है कि आधुनिक सर्जरी की बुनियाद सदियों पहले भारत की धरती पर रखी गई थी और महर्षि सुश्रुत वास्तव में शल्य चिकित्सा के पितामह हैं।