भोपाल। मध्य प्रदेश में कुपोषण के खिलाफ लंबे समय से चलाए जा रहे सरकारी अभियानों और हजारों करोड़ रुपये के खर्च के बावजूद स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-6 की ताजा रिपोर्ट ने राज्य में बच्चों के पोषण स्तर को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार कई महत्वपूर्ण संकेतकों में सुधार की बजाय गिरावट दर्ज की गई है।
एनएफएचएस-6 (2023-24) के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में तीव्र कुपोषण (वेस्टिंग) की दर बढ़कर 23.8 प्रतिशत हो गई है, जबकि राष्ट्रीय औसत 19.3 प्रतिशत है। इससे पहले एनएफएचएस-5 (2019-21) में यह आंकड़ा 18.9 प्रतिशत था। यानी चार वर्षों में तीव्र कुपोषण के मामलों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कम वजन वाले बच्चों (अंडरवेट) की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। वर्ष 2019-21 में यह दर 33 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 39.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इस आंकड़े के साथ मध्य प्रदेश देश के सबसे खराब प्रदर्शन वाले राज्यों में शामिल हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति दर्शाती है कि बच्चों तक पर्याप्त और संतुलित पोषण नहीं पहुंच पा रहा है।
हालांकि, स्टंटिंग यानी उम्र के अनुसार कम लंबाई वाले बच्चों की संख्या में कुछ कमी आई है। यह आंकड़ा 35.7 प्रतिशत से घटकर 31.4 प्रतिशत हो गया है। इसके बावजूद राज्य का लगभग हर तीसरा बच्चा अब भी ठिगनेपन की समस्या से जूझ रहा है।
राज्य सरकार महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा विभागों के माध्यम से हर वर्ष लगभग 6000 करोड़ रुपये कुपोषण उन्मूलन पर खर्च कर रही है। वर्ष 2026-27 के बजट में केवल पोषण 2.0 और सक्षम आंगनबाड़ी कार्यक्रम के लिए 3863 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। बावजूद इसके, जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पोषण आहार की गुणवत्ता, वितरण व्यवस्था, निगरानी प्रणाली और लाभार्थियों की नियमित ट्रैकिंग में अब भी कई कमियां हैं। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में समस्या अधिक गंभीर है। उनका मानना है कि कुपोषण केवल स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि गरीबी, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता, मातृ स्वास्थ्य और जागरूकता से जुड़ी बहुआयामी चुनौती है, जिसके समाधान के लिए समग्र प्रयासों की आवश्यकता है।