नई दिल्ली। राज्यसभा चुनाव से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज कर दी है। नटराजन ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन रद्द किए जाने के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अदालत ने चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि एक बार चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद न्यायालय के हस्तक्षेप की सीमाएं तय होती हैं। ऐसे मामलों में अदालत सीधे चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि उसने याचिकाकर्ता की सभी दलीलों पर विचार किया, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में राहत देने का कोई आधार नहीं पाया।
याचिका में दावा किया गया था कि रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) ने नामांकन पत्र को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उम्मीदवार ने फॉर्म अधूरा भरा था और अपने खिलाफ लंबित शिकायत से जुड़ी जानकारी का खुलासा नहीं किया था। मीनाक्षी नटराजन की ओर से तर्क दिया गया कि संबंधित मामले में न तो आरोप तय हुए थे और न ही किसी अदालत ने संज्ञान लिया था। ऐसे में जानकारी नहीं देने के आधार पर नामांकन रद्द करना अनुचित और कानून के विपरीत है।
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि नामांकन निरस्त होने के बाद निर्वाचन आयोग से भी संपर्क किया गया था। याचिकाकर्ता ने लिखित आवेदन देने के साथ व्यक्तिगत रूप से अपना पक्ष भी रखा, लेकिन आयोग की ओर से कोई आदेश जारी नहीं किया गया।
दूसरी ओर निर्वाचन आयोग और मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि चुनाव लड़ना कोई मौलिक अधिकार नहीं बल्कि वैधानिक अधिकार है। यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन रद्द होता है तो उसके लिए चुनाव याचिका ही उचित कानूनी उपाय है।
मामला मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट से जुड़ा है, जहां मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पत्र में कथित रूप से एक आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का आरोप लगा था। भाजपा उम्मीदवार महेश केवट ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई थी। नामांकन रद्द होने के बाद तीसरी राज्यसभा सीट पर मुकाबला समाप्त हो गया और महेश केवट के निर्विरोध निर्वाचित होने का रास्ता साफ हो गया।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी कानूनी अनिश्चितता भी समाप्त हो गई है और राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।