असम में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में बढ़ते कदमों ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। असदुद्दीन ओवैसी ने असम सरकार के प्रस्तावित यूसीसी विधेयक पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे मुसलमानों पर “बैकडोर से हिंदू कानून थोपने” की कोशिश बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है।
ओवैसी ने कहा कि उत्तराधिकार, विरासत और तलाक जैसे मामलों में हिंदू सिद्धांतों को लागू करने का प्रयास किया जा रहा है। उनके मुताबिक, यह कदम केवल हिंदू संस्कृति को संरक्षित करने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है, जबकि मुसलमानों को जबरन इन कानूनों को मानने के लिए मजबूर किया जाएगा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब संविधान सभी समुदायों को अपनी संस्कृति बचाने का अधिकार देता है, तो आदिवासी समुदाय को यूसीसी से बाहर क्यों रखा गया है।
हैदराबाद सांसद ने इस्लामी विरासत कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि इस व्यवस्था में बेटियों को उनका तय हिस्सा सुनिश्चित किया जाता है, जबकि प्रस्तावित यूसीसी में वसीयत के जरिए उन्हें अधिकारों से वंचित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसका लैंगिक न्याय से कोई लेना-देना नहीं है।
दूसरी ओर, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने यूसीसी विधेयक का बचाव करते हुए इसे महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि यह कानून सभी धर्मों में बहुविवाह और दो विवाह को अवैध बनाएगा तथा महिलाओं को विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में समान अधिकार देगा।
सरकार के अनुसार, सभी विवाह और तलाक का 60 दिनों के भीतर पंजीकरण अनिवार्य होगा। लड़कों की न्यूनतम विवाह आयु 21 वर्ष और लड़कियों की 18 वर्ष तय की गई है। हालांकि अनुसूचित जनजातियों को इस कानून से छूट दी गई है।
मुख्यमंत्री सरमा ने यह भी दावा किया कि असम तेजी से आर्थिक विकास की ओर बढ़ रहा है और 2028 तक राज्य की अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।