भारत में बढ़ते गोल्ड इम्पोर्ट और सोने की तस्करी को लेकर एक बार फिर 1968 के गोल्ड कंट्रोल एक्ट की चर्चा तेज हो गई है। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने के लिए सरकार आज भी सोने के आयात पर भारी टैक्स और ड्यूटी लगाती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कड़े प्रतिबंध हमेशा समाधान साबित नहीं होते।
दरअसल, 1960 के दशक में भारत गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा था और सरकार को आयात नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम उठाने पड़े। इसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi की सरकार ने 1968 में गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू किया। इस कानून के तहत बिना लाइसेंस सोने का व्यापार गैरकानूनी बना दिया गया और लोगों के घरों में सोना रखने की सीमा तय कर दी गई।
नियमों के अनुसार विवाहित महिलाओं को 500 ग्राम, अविवाहित महिलाओं को 250 ग्राम और पुरुषों को केवल 100 ग्राम सोना रखने की अनुमति थी। सरकार को उम्मीद थी कि इससे सोने की मांग घटेगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। हालांकि, इसका उल्टा असर देखने को मिला।
भारत में सोने का सामाजिक और पारंपरिक महत्व होने के कारण लोगों की मांग कम नहीं हुई। नतीजतन दुबई समेत कई समुद्री रास्तों से सोने की तस्करी तेजी से बढ़ी। इसी दौर में मुंबई का अंडरवर्ल्ड भी मजबूत हुआ और छोटे ज्वेलर्स का कारोबार प्रभावित होने लगा। बाजार का बड़ा हिस्सा कालाबाजारी की गिरफ्त में चला गया।
इसके बाद 1991 के आर्थिक संकट के दौरान प्रधानमंत्री P. V. Narasimha Rao और वित्त मंत्री Manmohan Singh ने आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाई। सरकार ने माना कि अत्यधिक पाबंदियां कालाबाजारी को बढ़ावा देती हैं। इसी सोच के तहत गोल्ड कंट्रोल एक्ट को समाप्त कर दिया गया। इसके बाद सोने का आयात आसान हुआ और ज्वेलरी उद्योग संगठित क्षेत्र में तेजी से विकसित होने लगा। हालांकि, बढ़ता गोल्ड इम्पोर्ट आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।