नई दिल्ली। Supreme Court of India ने धार्मिक प्रथाओं को अदालतों में लगातार चुनौती दिए जाने पर गंभीर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि हर धार्मिक परंपरा और रिवाज को संवैधानिक अदालतों में चुनौती दी जाने लगी, तो इससे न केवल धर्म और सामाजिक संरचना प्रभावित होगी, बल्कि अदालतों पर भी मामलों का भारी बोझ बढ़ जाएगा।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने की। पीठ विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इनमें Sabarimala Temple और दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण मामले शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान जस्टिस B. V. Nagarathna ने कहा कि भारत में धर्म समाज की गहरी जड़ों से जुड़ा हुआ है। यदि हर व्यक्ति धार्मिक परंपराओं पर सवाल उठाने लगे, तो इसका असर सामाजिक ताने-बाने पर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अब मंदिरों के खुलने और बंद होने जैसे छोटे मुद्दे भी अदालतों तक पहुंच रहे हैं, जो चिंता का विषय है।
वहीं जस्टिस M. M. Sundresh ने कहा कि इस तरह के मामलों को लगातार बढ़ावा देने से धर्मों के भीतर विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है और संवैधानिक अदालतों पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा।
यह मामला दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की प्रथा से जुड़ा है। 1986 में दायर याचिका में 1962 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें समुदाय के धार्मिक मामलों में बहिष्कार को वैध माना गया था।
सुधारवादी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Raju Ramachandran ने दलील दी कि यदि कोई धार्मिक प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
फिलहाल इस संवेदनशील मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है और अदालत धर्म तथा संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने पर विचार कर रही है।