ईरान–इस्राइल टकराव से दुनिया संकट में—क्या भारत निभा सकता है शांति दूत की भूमिका?

पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। Israel द्वारा ईरान के दक्षिण पार्स गैस फील्ड पर हमले के बाद हालात और गंभीर हो गए हैं। जवाबी कार्रवाई में Iran ने कतर और सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया, जिससे ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी और विश्वभर में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला।

इस बढ़ते संकट के बीच Narendra Modi ने शांति स्थापना के लिए सक्रिय कूटनीतिक पहल की है। उन्होंने France, Jordan, Oman और Malaysia के नेताओं से बातचीत कर क्षेत्र में तनाव कम करने पर जोर दिया। भारत की यह पहल उसकी पारंपरिक शांति समर्थक विदेश नीति को दर्शाती है।

इस घटनाक्रम ने United States और Israel के बीच मतभेदों को भी उजागर किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि इस्राइल ने हमला उनकी सलाह के बिना किया, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में दरार के संकेत मिले हैं। वहीं, NATO देशों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए सैन्य सहयोग देने से इनकार कर दिया, जिससे अमेरिका की स्थिति और जटिल हो गई है।

अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर मतभेद सामने आ रहे हैं। पूर्व अधिकारियों और खुफिया एजेंसियों से जुड़े लोगों ने युद्ध के औचित्य पर सवाल उठाए हैं। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है।

ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण Strait of Hormuz क्षेत्र में अस्थिरता से कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ऐसे में भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश के लिए स्थिरता बनाए रखना आवश्यक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने कूटनीतिक संबंधों का उपयोग करते हुए अमेरिका, ईरान और इस्राइल के बीच संवाद स्थापित कराने की दिशा में प्रयास जारी रखने चाहिए। यदि भारत इस दिशा में सफल रहता है, तो यह न केवल क्षेत्रीय शांति के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी साख भी और मजबूत होगी।

 

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