पश्चिम बंगाल में शनिवार शाम चुनाव आयोग द्वारा जारी की गई अंतिम मतदाता सूची ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के बाद सामने आए आंकड़ों के अनुसार राज्य में करीब 60 लाख 6 हजार 675 मतदाताओं को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ यानी विचाराधीन श्रेणी में रखा गया है। इन मतदाताओं के दस्तावेज और नागरिकता से जुड़े मामलों की जांच चल रही है, जिसके कारण फिलहाल उनके मतदान अधिकार पर रोक लगा दी गई है।
चुनाव आयोग के अनुसार इन सभी मामलों की जांच न्यायिक प्रक्रिया के तहत की जा रही है। Supreme Court of India के निर्देश पर इन मामलों की सुनवाई संबंधित उच्च न्यायालय की न्यायिक पीठ द्वारा की जा रही है। अधिकारियों का दावा है कि चुनाव की घोषणा से पहले अधिकतर मामलों में निर्णय लेने की कोशिश की जाएगी, ताकि मतदाता सूची पूरी तरह स्पष्ट हो सके।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अहम पहलू संदिग्ध मतदाताओं का भौगोलिक वितरण है। आंकड़े बताते हैं कि जिन जिलों की सीमा सीधे बांग्लादेश से लगती है, वहीं सबसे अधिक संख्या में नामों को जांच के दायरे में रखा गया है। लंबे समय से इन इलाकों में अवैध घुसपैठ और मतदाता सूची में हेरफेर के आरोप लगते रहे हैं, जिससे यह मुद्दा और संवेदनशील बन गया है।
जिला स्तर पर सबसे अधिक चौंकाने वाला आंकड़ा मुर्शिदाबाद से सामने आया है। मुर्शिदाबाद में अकेले 11 लाख 1 हजार 145 मतदाताओं को संदिग्ध माना गया है। यह संख्या राज्य के कुल संदिग्ध मामलों का लगभग 18 प्रतिशत है। इतने बड़े पैमाने पर नामों का ‘होल्ड’ पर जाना प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुर्शिदाबाद के बाद मालदा जिले की स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है, जहां 8 लाख 28 हजार 127 मतदाता जांच के घेरे में हैं। जिले की कुल आबादी और क्षेत्रफल के अनुपात में यह संख्या काफी प्रभावशाली मानी जा रही है।
इसी क्रम में उत्तर 24 परगना में 5 लाख 91 हजार 252 मतदाताओं को संदिग्ध श्रेणी में रखा गया है, जबकि दक्षिण 24 परगना में 5 लाख 22 हजार से अधिक नामों को फिलहाल मतदान सूची से अलग रखा गया है। इन चार सीमावर्ती जिलों—मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना—को मिलाकर ही कुल संदिग्ध मतदाताओं का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा बनता है। यह तथ्य इस ओर संकेत करता है कि समस्या का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे क्षेत्रों में केंद्रित है।
इसके विपरीत, राज्य के अंदरूनी जिलों में स्थिति अपेक्षाकृत सामान्य दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर झाड़ग्राम में संदिग्ध मतदाताओं की संख्या केवल 6 हजार 682 है। इसी तरह पहाड़ी जिला कलिम्पोंग में यह आंकड़ा महज 6 हजार 790 तक सीमित है। सीमावर्ती और गैर-सीमावर्ती जिलों के बीच का यह बड़ा अंतर प्रशासनिक चुनौती को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
वर्तमान में इन 60 लाख से अधिक मामलों की जांच के लिए सैकड़ों न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया गया है। दस्तावेजों की वैधता, नागरिकता संबंधी प्रमाण और अन्य आवश्यक कागजात की गहन जांच की जा रही है। जब तक संबंधित अधिकारी अपनी जांच पूरी कर अंतिम रिपोर्ट नहीं सौंप देते, तब तक इन मतदाताओं को मुख्य सूची में शामिल नहीं किया जाएगा और वे मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगामी चुनाव में बड़ा प्रभाव डाल सकता है। सीमावर्ती जिलों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम ‘होल्ड’ पर जाने से स्थानीय राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि अंतिम फैसला न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा, लेकिन इस बीच राज्य की सियासत में मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।
अब सबकी नजर न्यायालय की सुनवाई और चुनाव आयोग की अगली कार्रवाई पर टिकी है, क्योंकि यह फैसला न सिर्फ लाखों मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि राज्य के चुनावी भविष्य पर भी असर डाल सकता है।