विशेष लेख। भारत में बढ़ती जनसंख्या को लंबे समय से बेरोजगारी, गरीबी और पिछड़ेपन जैसी समस्याओं से जोड़कर देखा जाता रहा है। समय-समय पर जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की मांग भी उठती रही है। वहीं दूसरी ओर, कुछ हिंदू धर्माचार्यों और **मोहन भागवत** जैसे नेताओं ने हिंदुओं की घटती जनसंख्या पर चिंता जताते हुए अधिक संतानों की वकालत की है।
दिलचस्प यह है कि जहां एक ओर जनसंख्या नियंत्रण की बात होती है, वहीं दूसरी ओर अधिक बच्चों के जन्म को सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से आवश्यक बताया जाता है। प्रधानमंत्री **नरेंद्र मोदी** पहले ही कह चुके हैं कि बढ़ती जनसंख्या देश की ताकत भी हो सकती है, यदि उसे सही दिशा और अवसर मिलें।
संयुक्त राष्ट्र के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.47 अरब से अधिक हो चुकी है, जो विश्व में सर्वाधिक है। विश्व की कुल आबादी का लगभग 17 प्रतिशत भारत में निवास करता है, जबकि वैश्विक भू-भाग में भारत की हिस्सेदारी केवल 2.4 प्रतिशत है। ऐसे में संसाधनों पर दबाव स्वाभाविक है।
हालांकि एक सकारात्मक पहलू यह है कि देश की करीब 68 प्रतिशत आबादी कामकाजी आयु वर्ग में है। इसे ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ कहा जाता है। लेकिन चुनौती यह है कि बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार या अल्प-कुशल हैं। रोजगार सृजन और कौशल विकास दोनों ही बड़े लक्ष्य हैं, जिन्हें हासिल करना आसान नहीं है।
भारत आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीसरे स्थान तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है। फिर भी प्रति व्यक्ति आय के मामले में हम विकसित देशों से काफी पीछे हैं। यही कारण है कि अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ रही है। केंद्र सरकार की **प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना** के तहत 80 करोड़ से अधिक लोग मुफ्त अनाज पर निर्भर हैं।
2024 के **विश्व भूख सूचकांक** में भारत की रैंकिंग भी चिंता का विषय रही है। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या देश अतिरिक्त आबादी का बोझ संभालने के लिए तैयार है?
जनसंख्या नियंत्रण कानून की मांग और अधिक बच्चों की अपील—दोनों के बीच नीति और राजनीति की बहस चल रही है। क्या देश की अधिकांश परिवार दो या उससे अधिक बच्चों का समुचित पालन-पोषण कर सकते हैं? क्या संसाधन, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि बढ़ती आबादी को गुणवत्तापूर्ण जीवन दे सके?
इन सवालों का स्पष्ट उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है। लेकिन इतना तय है कि जनसंख्या केवल संख्या नहीं, बल्कि अवसर, संसाधन और नीति की कसौटी भी है। भविष्य की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत अपने मानव संसाधन को बोझ नहीं, बल्कि शक्ति में कैसे परिवर्तित करता है।