ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म आज बच्चों और किशोरों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इसी आभासी दुनिया में एक खतरनाक प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है। सुरक्षा एजेंसियों और शोध संस्थानों की हालिया रिपोर्टों में खुलासा हुआ है कि आतंकी और नफरत फैलाने वाले संगठन लोकप्रिय गेमिंग प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बच्चों तक पहुंच बनाने के लिए कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म्स पर पहले बच्चों से दोस्ती की जाती है। गेमिंग टिप्स, चैट और टीम प्ले के बहाने भरोसा जीता जाता है। इसके बाद उन्हें निजी सर्वर, प्राइवेट ग्रुप और क्लोज कम्युनिटी चैट चैनलों में जोड़ा जाता है। यहीं से धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़ी सामग्री साझा की जाती है और बच्चों को मानसिक रूप से प्रभावित करने की कोशिश होती है।
कुछ मामलों में डिजिटल सिमुलेशन के जरिए हिंसक हमलों जैसी परिस्थितियां दिखाकर बच्चों की सोच को प्रभावित किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नई डिजिटल पीढ़ी सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स में अत्यधिक सक्रिय रहती है, जिससे उन्हें निशाना बनाना आसान हो गया है।
चिंता की बात यह भी है कि कुछ प्लेटफॉर्म्स पर निजी चैट फीचर्स और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन का इस्तेमाल कर बच्चों से सीधा संपर्क साधा जाता है। शुरुआती स्तर पर साधारण बातचीत होती है, लेकिन बाद में उन्हें उग्र विचारों की ओर मोड़ने की कोशिश की जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस खतरे से निपटने में माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी रखना, गेमिंग का समय सीमित करना और पैरेंटल कंट्रोल फीचर का उपयोग करना जरूरी है। साथ ही बच्चों से खुलकर बातचीत कर उन्हें डिजिटल सुरक्षा के प्रति जागरूक करना भी समय की मांग है।
सुरक्षा एजेंसियां इस प्रवृत्ति पर नजर बनाए हुए हैं, लेकिन समाज और परिवारों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है।