धर्मपाल धनखड़ भारत में मिलावटी खाद्य पदार्थों और नकली सामान का कारोबार चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुका है। अनुमान है कि देश में नकली और मिलावटी उत्पादों का बाजार एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का हो गया है। इससे न केवल उपभोक्ताओं की सेहत खतरे में है, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान हो रहा है। सरकार को जीएसटी के रूप में हर साल लगभग 58 हजार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। हाल के वर्षों में नकली उत्पादों के मामलों में 24 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
साल 2025-26 में खाद्य पदार्थों के 1.55 लाख नमूनों की जांच की गई, जिनमें से 27,567 नमूने असुरक्षित पाए गए। इनमें यूरिया, डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा और हानिकारक सिंथेटिक रंग जैसे तत्व मिले। गुजरात के साबरकांठा में हाल ही में ऐसी फैक्टरी पकड़ी गई, जहां 300 लीटर असली दूध से 1700-1800 लीटर नकली दूध तैयार कर आसपास के जिलों में सप्लाई किया जा रहा था।
दूध उत्पादक राज्यों—गुजरात, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश—में नकली दूध, मावा और घी का धंधा तेजी से फैल रहा है। मेवात क्षेत्र नकली डेयरी उत्पादों का बड़ा केंद्र बन चुका है। मंदिरों तक में मिलावट के मामले सामने आए हैं। आंध्र प्रदेश स्थित तिरुपति मंदिर के प्रसाद में मिलावटी घी के उपयोग की जांच में प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई चर्चा में रही।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के अनुसार पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में 70 प्रतिशत तक गड़बड़ी पाई गई है। मिलावटी भोजन से लीवर, किडनी, कैंसर और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं। नकली दवाइयां भी असामयिक मौतों का कारण बन रही हैं।
कड़े कानून होने के बावजूद मिलावट का यह गोरखधंधा रिश्वतखोरी और राजनीतिक संरक्षण के कारण थम नहीं रहा। जरूरत है मजबूत निगरानी तंत्र, त्वरित जांच सुविधाओं और कठोर कार्रवाई की। साथ ही, उपभोक्ताओं की जागरूकता भी इस लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।