बढ़ती कृषि वृद्धि के बीच कर्ज में डूबा किसान, आखिर कहां चूक रही व्यवस्था?

देश की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र लगातार मजबूती दिखा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले पांच वर्षों में कृषि की औसत वृद्धि दर 4.4 प्रतिशत और बीते एक दशक में 3.9 प्रतिशत रही है। इतना ही नहीं, कृषि आज भी देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला क्षेत्र है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि किसान लगातार कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है।

हाल ही में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री **शिवराज सिंह चौहान** ने संसद में जानकारी दी कि देश के प्रत्येक किसान परिवार पर औसतन 74,121 रुपये का कर्ज है। आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में प्रति किसान परिवार पर ढाई लाख रुपये के आसपास कर्ज है। वहीं पंजाब और हरियाणा जैसे अन्नदाता राज्यों में भी दो लाख रुपये से अधिक का औसत कर्ज है। दूसरी ओर नागालैंड, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में कर्ज अपेक्षाकृत कम है, लेकिन कोई भी राज्य पूरी तरह इससे मुक्त नहीं है।

किसानों की बदहाल स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण फसलों का उचित मूल्य न मिलना और कृषि लागत में लगातार बढ़ोतरी है। खाद, बीज, कीटनाशक और मजदूरी महंगी हो चुकी है। जलवायु परिवर्तन, बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं। सरकार की ओर से किसानों की आय दोगुनी करने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर भी किसान संगठनों की नाराजगी बनी रहती है। उनका कहना है कि लागत के पूर्ण आकलन के बजाय कम आधार पर MSP तय किया जाता है, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। ऊपर से सभी फसलें समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जातीं, जिससे किसानों को बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर फसल बेचनी पड़ती है।

स्पष्ट है कि कृषि वृद्धि के आंकड़ों के पीछे किसानों की आर्थिक हकीकत अब भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.