देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में उत्तर-पूर्वी छात्र एंजेल चकमा की निर्मम हत्या को लेकर सियासत तेज हो गई है।
उत्तराखंड कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री गरिमा मेहरा दसौनी ने इस घटना को केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि देश की संवेदनशीलता और शासन व्यवस्था की गंभीर विफलता करार दिया है। उन्होंने कहा कि जिस देश में एक छात्र को मरते समय यह कहना पड़े कि “मैं भारतीय हूं”, वह पूरे लोकतंत्र और समाज के लिए शर्मनाक क्षण है।
गरिमा दसौनी ने कहा कि एंजेल चकमा पढ़ाई के उद्देश्य से देहरादून आया था। वह न तो किसी अपराध में लिप्त था और न ही किसी आंदोलन का हिस्सा। वह केवल एक छात्र था, जो अपने सपनों को साकार करने आया था। लेकिन नस्लीय गालियों का विरोध करना उसे अपनी जान से हाथ धोने का कारण बन गया। कुछ ही मिनटों में चाकू से गोदकर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया गया, और बाद में उसकी मौत हो गई।
उन्होंने कहा कि यह घटना महज कानून-व्यवस्था की नाकामी नहीं, बल्कि समाज की सोच, प्रशासन की संवेदनहीनता और सरकार की उदासीनता को उजागर करती है। गरिमा ने बताया कि एंजेल चकमा के पिता ने अपना पूरा जीवन पैरामिलिट्री फोर्स में देश की सेवा में बिताया है। ऐसे परिवार के बेटे की इस तरह हत्या होना, और उस पर भी समय पर कार्रवाई न होना, धामी सरकार की लचर कानून व्यवस्था को दर्शाता है।
कांग्रेस नेत्री ने आरोप लगाया कि घटना के बाद प्राथमिकी दर्ज करने में 12 दिनों की देरी हुई, जो पुलिस प्रशासन की गंभीर लापरवाही को साबित करती है। यदि समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद एंजेल की जान बचाई जा सकती थी।
गरिमा दसौनी ने कहा कि देहरादून देशभर के छात्रों के लिए शिक्षा का बड़ा केंद्र रहा है। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान सख्त कानून व्यवस्था के कारण बाहरी राज्यों के छात्र और उनके अभिभावक यहां खुद को सुरक्षित महसूस करते थे। दूसरे राज्यों से आने वाले छात्रों के कारण उत्तराखंड को करोड़ों रुपये का राजस्व भी मिलता है, लेकिन इस घटना के बाद छात्रों और अभिभावकों में असुरक्षा की भावना बढ़ गई है, जिससे राज्य की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंची है।
उन्होंने सवाल उठाया कि 9 दिसंबर को हुई इस घटना पर सरकार ने 29 दिसंबर को एंजेल चकमा के पिता से बातचीत क्यों की? यह देरी सरकार की असंवेदनशीलता को दर्शाती है।
गरिमा ने केंद्र सरकार पर भी निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी मंचों से उत्तर-पूर्व को ‘अष्टलक्ष्मी’ कहते हैं, लेकिन जब उत्तर-पूर्व का एक बेटा देश के भीतर ही नस्लीय हिंसा का शिकार होता है, तो केंद्र की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। यह बढ़ती नस्लीय असंवेदनशीलता का परिणाम है, जिस पर केंद्र सरकार आंखें मूंदे बैठी है।
उन्होंने कहा कि आज उत्तराखंड में छात्र असुरक्षित हैं, अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं और अब उत्तर-पूर्वी छात्र भी सुरक्षित नहीं हैं। गरिमा ने इसे भाजपा की नफरत की राजनीति का परिणाम बताते हुए कहा कि नफरत की राजनीति का अंतिम परिणाम हमेशा हिंसा होता है।
कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर ठोस मांगें भी रखीं। उन्होंने कहा कि नस्लीय अपराधों को आईपीसी में अलग श्रेणी में शामिल किया जाए, हर शिक्षा नगर में ‘नॉर्थ-ईस्ट स्टूडेंट प्रोटेक्शन सेल’ का गठन किया जाए, पुलिस और शिक्षण संस्थानों के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण अनिवार्य हो और एंजेल चकमा हत्याकांड को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाकर शीघ्र न्याय दिलाया जाए।
गरिमा ने कहा कि यह बहस राजनीति की नहीं, बल्कि संविधान बनाम नफरत की है। जब एक भारतीय छात्र को अपनी पहचान साबित करनी पड़े, तो यह पूरे देश की सामूहिक विफलता है।