आफ़रीन हुसैन
बिहार में सत्ता का समीकरण बदलता नहीं है
बस चेहरे बदलते हैं, तरीके वही रहते हैं।
एक बार फिर सिद्ध हो गया कि यहाँ लोकतंत्र का असली अर्थ “जनता की सरकार” नहीं, बल्कि “परिवार की सरकार” है। कांग्रेस को परिवारवाद का गढ़ बताकर दूसरों ने अपनी राजनीति चमकाई थी, पर बिहार चुनाव के बाद जो दृश्य सामने आए हैं, उनसे यही लगता है कि परिवारवाद विरोध सिर्फ भाषणों तक सीमित था और असल खेल बंद कमरों में सेट हो चुका था।
नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण वाले दिन उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को बिना चुनाव लड़े ही मंत्री बना दिया गया।
हाँ, आपने सही पढ़ा बिना चुनाव लड़े!
यानी जनता की राय बाद में, परिवार का फैसला पहले।
सियासत की इस कहानी के पीछे का प्लॉट और भी दिलचस्प है उपेंद्र कुशवाहा ने पहले अपनी पत्नी को टिकट दिलाकर विधायक बनवाया, फिर NDA में टिके रहने के नाम पर एक MLC सीट की मांग कर दी।डील पट गई। अब बेटा मंत्री, पत्नी विधायक
और नीतीश कुमार खड़े देखते रह गए।
जितनी चतुराई से यह “पारिवारिक सेटिंग” हुई, उसे देखकर तो यही कहना पड़ेगा
परिवारवाद पर गालियाँ सबने दीं, पर सबसे तेज़ दौड़ परिवारवाद में वही रहे।
अब कुछ कड़क, चुभते, व्यंग्य भरे सवाल
जो बिहार की राजनीति से पूछे ही जाने चाहिए: क्या बिहार में मंत्री बनने का सबसे छोटा रास्ता यही है बैलट बॉक्स नहीं, नेता का पारिवारिक बॉक्स?
चुनाव लड़ने की क्या जरूरत? जब घर पर ही “एमएलए/एमएलसी + मंत्री पद” का पैकेज मिल सकता हो?
यह योग्यता का युग है या वंशवाद का प्राइम टाइम? जनता वोट किसे देती है
उम्मीदवार को, पार्टी को या नेताओं के घर की अगली पीढ़ी को?
कांग्रेस पर परिवारवाद का तीर चलाने वाले दल अब किस मुंह से बोलेंगे
“हम उदाहरण नहीं बनना चाहते थे, पर मजबूरी थी”? ये कैसा लोकतंत्र है जिसमें मंत्री पहले और जनादेश बाद में आता है?
नीतीश कुमार को असल में कुछ पता नहीं था, या यह भी राजनीति का “सब चलता है” अध्याय है?
क्या बिहार की राजनीति अब पूरी तरह “फैमिली पैकेज डील” में बदल चुकी है
एक सीट लो, दो कुर्सियाँ फ्री!
जनता की किस्मत क्या नेताओं के बच्चों की करियर प्लानिंग के हिसाब से तय होगी?
क्या यह वही बिहार है जहाँ परिवारवाद के खिलाफ नारे लगते थे? या फिर नारे अचानक से ‘रीब्रांड’ हो गये।