परमात्म वाणी हिंदी बनी सतेंद्र के लिए विद्या सागर का माध्यम!

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
ब्रह्माकुमार डॉ सतेंद्र यूं तो स्वयं में ही अकादमिक रूप से डॉक्टरेट है और मूल्यपरक शिक्षा क्षेत्र में जाने माने प्राध्यापक है।प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की ईश्वरीय सेवाओं के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर चुके सतेंद्र बाल ब्रह्मचारी है और विश्व विद्यालय के प्रबंधन विभाग की सेवाओं को बखूबी अंजाम देते है।मूलतः उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद के ननोता क्षेत्र में एक कृषक परिवार में जन्मे सतेंद्र बचपन से ही जहां पढाई में अव्वल रहे वही आध्यात्मिक एवं धार्मिक प्रवर्ति के चलते उन्होंने सांसारिक सुख सुविधाओं ,माया मोह आदि का परित्याग कर अपना सम्पूर्ण जीवन ही रूहानियत के हवाले कर दिया।बड़े सवेरे अमृत बेला में उठकर परमात्म ध्यान करना,प्रतिदिन ईश्वरीय वाणी सुनकर उसपर अम्ल करना और स्वेत वस्त्रों में विरक्ति भाव का सन्त,सन्यासी जैसा जीवन जीना उनके जीवन का ध्येय बन गया है।सतेंद्र ने मूल्य परक शिक्षा में पीजी डिप्लोमा करके पीएचडी तक का शैक्षणिक सफर तय किया और अपनी योग्यता व अनुभव का उपयोग ब्रह्माकुमारीज संस्था के लिए कर रहे है।चूंकि ब्रह्माकुमारीज में प्रतिदिन 140 देशों तक पहुंचने वाली ईश्वरीय वाणी मुरली जिसकी मूल भाषा हिंदी है,को आत्मसात किया हुआ है।उनकी आध्यात्मिक सेवाओं में हिंदी का उपयोग व देश दुनिया मे ईश्वरीय ज्ञान का माध्यम मूलतः हिंदी होने से प्रेरित होकर ही ब्रह्माकुमारीज की मोटिवेशनल स्पीकर राजयोगिनी बीके उषा दीदी,मोटिवेशनल स्पीकर राजयोगी बीके सूर्य व कविराज बीके विवेक भाई को बीते वर्षो में देश की प्रतिष्ठित हिंदी सेवी संस्था विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा विद्या वाचस्पति व विद्या सागर की मानद उपाधियों नवाज़ा जा चुका है।वही विद्यापीठ के इस वर्ष के हरिद्वार में उत्तराखंड संस्कृत अकादमी परिसर में हुए वार्षिक अधिवेशन व सम्मान समारोह में राजयोगी बीके सतेंद्र को ब्रह्माकुमारीज मुख्यालय आबू रोड से बुलाकर विद्या सागर की मानद उपाधि प्रदान की गई,जबकि राजयोगिनी बीके मंजू दीदी को भारत गौरव से विभूषित किया गया।जो एक सुखद उपलब्धि है। यह सम्मान उन्हें विद्यापीठ के कुलपति डॉ दयानन्द जायसवाल, उपकुलपति डॉ श्रीगोपाल नारसन व उत्तराखंड के संस्कृत शिक्षा निदेशक डॉ आनन्द भारद्वाज ने संयुक्त रूप से एक भव्य समारोह में प्रदान किया है,जिसमे करीब 12 राज्यो के हिंदी सेवी साहित्यकारों की भागीदारी रही।

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