छिंदवाड़ा। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के चांदामेटा क्षेत्र से लापता हुई अनुसूचित जाति की दो नाबालिग बहनें—आराध्या और अवनी वर्मा—73 दिन बाद भी बरामद नहीं हुई हैं। परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है, लेकिन प्रशासन की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
यह केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे बहुजन समाज की अस्मिता और सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है। सवाल यह है कि जब संविधान ने सभी को समानता और न्याय का अधिकार दिया है, तो बहुजन समाज की बेटियों को इंसाफ क्यों नहीं मिल पा रहा?
प्रशासन की चुप्पी पर गुस्सा
आज़ाद समाज पार्टी ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर यह घटना किसी प्रभावशाली वर्ग से जुड़ी होती तो पुलिस-प्रशासन दिन-रात एक कर देता। लेकिन यहाँ 73 दिन गुजरने के बाद भी न जांच तेज हुई और न ही जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई हुई। प्रशासन केवल “प्रक्रिया” और “जाँच” की औपचारिकता निभा रहा है, जबकि जमीनी नतीजे शून्य हैं।
जातिगत भेदभाव के आरोप
कई सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाया है कि क्या इस लापरवाही के पीछे जातिगत भेदभाव छिपा है? दलित और आदिवासी समाज से जुड़ी बच्चियों के मामले अक्सर ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। यही कारण है कि आज भी न्याय बहुजन समाज की बेटियों के लिए मृगतृष्णा बना हुआ है।
एनसीआरबी की चिंताजनक तस्वीर
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश के आदिवासी व दलित बहुल जिलों में हर साल हज़ारों नाबालिग बच्चियाँ लापता होती हैं, जिनमें से बड़ी संख्या अब तक बरामद नहीं हो पाती। यह स्थिति बताती है कि व्यवस्था बेटियों की सुरक्षा देने में पूरी तरह विफल है।
आज़ाद समाज पार्टी की चेतावनी
पार्टी ने साफ़ कहा है कि यदि 15 दिन में दोनों बच्चियों की बरामदगी और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो सड़क से लेकर कलेक्टर और एसपी कार्यालय तक घेराव किया जाएगा। इस आंदोलन की पूरी ज़िम्मेदारी सत्ता और प्रशासन की होगी।
यह मामला केवल दो बच्चियों की गुमशुदगी नहीं, बल्कि जनता के विश्वास पर सीधा हमला है। यदि प्रशासन समय रहते नहीं चेता, तो बहुजन समाज की परिकल्पना अधूरी ही नहीं, बल्कि असंभव हो जाएगी।